साम्राज्यवादी मंसूबों का चीनी चक्रव्यूह

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पुष्परंजन
दो दिन के सम्मेलन में 29 शासन प्रमुखों और 13० अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के प्रतिनिधियों तथा संयुक्त राष्ट्र महासचिव की शिरकत के बाद चीन वन वेल्ट, वन रोड (ओबीओआर) प्रयासों को एक बड़ी कूटनीतिक सफलता के रूप में देख रहा है।

पेइचिंग में 16 मई को सम्मेलन के समापन से पहले भारत के छह पड़ोसी देशों ने अधोसंरचना से संबंधित 2० समझौतों पर हस्ताक्षर किये। इनमें श्रीलंका, बांग्लादेश, अफग़ानिस्तान, म्यांमार, नेपाल और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी हैं, जिन्हें ‘ओबीओआर’ में अपना फायदा दिखता है।

लेकिन क्या इस बहाने भारत को यह जताना है कि आपको कूटनीतिक रूप से हमने अलग-थलग कर दिया है? सबसे आपत्ति वाली बात पाक अधिकृत कश्मीर में चीनी परियोजनाओं का विस्तार है, जिसका आधिकारिक विरोध भारत करता रहा है।

‘वन बेल्ट, वन रोड’ और ‘मेरीटाइम सिल्क रोड’ चीन की दो पृथक परियोजनाएं हैं, जिसकी शुरुआत सितंबर और अक्तूबर 2०13 में की गई थी।

‘ओबीओआर’, शुरू में सिल्क रोड इकोनॉमिक बेल्ट (एसआरईबी) के रूप में लांच किया गया था, जिसका प्रधानमंत्री ली खछियांग ने चार वर्ष पहले एशिया और यूरोप के दौरों में जमकर प्रचार किया था। बाद में राष्ट्रपति शी जिनपिंग को वन बेल्ट, वन रोड (ओबीओआर) के रूप में दूसरे मकसद से परिवर्तित करना पड़ा। इससे ‘वन चाइना पॉलिसी’ के लक्ष्य भी पूरे हो रहे थे।

‘ओबीओआर’ के बहाने चीन छह कारिडोर का निर्माण करना चाहता है। पहला लक्ष्य न्यू यूरेशियन लैंड ब्रिज बनाना है, जो पश्चिमी चीन को पश्चिमी रूस से जोड़ेगा। दूसरा, मंगोलिया-रूस कॉरिडोर है, जो उत्तरी चीन और रूस के पूर्वी इलाके को लिंक करता है।

तीसरा, पश्चिमी चीन से तुर्की तक जाने वाली सड़क है, जिसे सेंट्रल-वेस्ट एशिया कॉरिडोर कहा गया है। चौथा, ‘चाइना-इंडोचाइना पेनिंसुला कॉरिडोर’ है, जो दक्षिणी चीन को सिंगापुर से जोड़ रहा है। पांचवां, चीन-पाकिस्तान कॉरिडोर है, जो बलूचिस्तान के ग्वादर पोर्ट से जुड़ चुका है, और छठा, चाइना-म्यांमार, बांग्लादेश, इंडिया कॉरिडोर है, जो दक्षिणी चीन को जोड़ता है।

यह ध्यान देने की बात है कि ‘ओबीओआर’ के इस नक्शे में नेपाल नहीं था। लेकिन दो साल पहले से नेपाल पर इसका दबाव था कि ‘ओबीओआर’ पर वह दस्तख़त करे। नेपाल ने सम्मेलन से दो दिन पहले शुक्रवार को ‘ओबीओआर’ पर दस्तख़त कर दिये।

अक्तूबर 2०13 में इंडोनेशिया की संसद को संबोधित करते हुए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ‘मेरीटाइम सिल्क रोड’ की आधिकारिक जानकारी दी थी। चीन, सिंगापुर से लेकर भूमध्य सागरीय देशों को मेरीटाइम सिल्क रोड से जोडऩे के जुगाड़ में है। चीन इस रेशम मार्ग के विस्तार की रक्षा कैसे करेगा? इस प्रश्न का उत्तर 2०3० तक तैयार होने वाली 1०० पनडुब्बियों, 4०० युद्धपोतों के निर्माण के फैसले से मिल जाता है।

चीन, जिस तरह नामों को बदल-बदल कर अपना उल्लू सीधा कर रहा है, वह भी दिलचस्प है। चीन ने पाक अधिकृत कश्मीर से लेकर ग्वादर तक जितना अधोसंरचनात्मक विकास किया, सड़कें बनाईं, उसका नाम ‘चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर’ रख दिया। इस सम्मेलन से पहले भारतीय आपत्ति पर दिल्ली स्थित चीनी दूतावास ने बड़ी ढिठाई से बयान दिया कि पाकिस्तान का यह इलाका उसकी क्षेत्रीय अखंडता का अहम हिस्सा है, इसलिए भारत का एतराज सही नहीं है।

‘चाइना-नेपाल कॉरिडोर कुछ इसी तरह के छद्म नामकरण का हिस्सा है, जिसका अंतिम लक्ष्य चीन के आर्थिक उपनिवेश को आगे बढ़ाना है। चीन इस आर्थिक नवउपनिवेशवाद को रेशम मार्ग के ब्रांड से प्रस्तुत कर रहा है। ईसा पूर्व 2०7 से 22० ईस्वी तक चीन में हान वंश के शासन के दौरान घोड़ों के ज़रिये भारत, पश्चिम एशिया, अफ्रीका और पूर्वी यूरोप तक रेशम का व्यापार होता था।

इस सिल्क रूट को यूनेस्को ने जिस नक्शे के ज़रिये मान्यता दी, उसमें वह मार्ग नहीं है जो ‘चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर’ (सीपीईसी) के ज़रिये चीन ने ग्वादर तक अपनी पहुंच बनाई। यह इतिहास के साथ छेड़छाड़ और कूटनीतिक फ्राड है, जो चीन लगातार कर रहा है।

जून 2०14 में यूनेस्को ने ‘छांगान-थिएनशान कॉरिडोर’ के रूप में जिस सिल्क रोड को मान्यता दी है, उससे कहीं अलग है चीन का यह ‘वन बेल्ट, वन रोड’ (ओबीओआर)। चीन से पूछा जाए कि क्या यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त ‘छांगान-थिएनशान कॉरिडोर’ में तिब्बत-नेपाल का वह मार्ग है, जिसके लिए वह हिमालय को काटकर हाईस्पीड रेल आरंभ करना चाहता है?

अगर है तो बताए!’सीपीईसी’ के विरुद्ध भारत अंतर्राष्ट्रीय अदालत या संयुक्त राष्ट्र में गया तो विवाद का बहुपक्षीय होना तय है, जिसकी ताक में लंबे समय से पाकिस्तान है। मगर पाकिस्तान में अब चीनी नीयत और पाकिस्तान को आर्थिक उपनिवेश बनाया जाना बहस के केंद्र में है।

वहां अवाम ने सोशल मीडिया के माध्यम से और डॉन जैसे अखबार ने संपादकीय के ज़रिये सवाल उठाया है कि ‘चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर’ के बहाने चीन विवादित कश्मीर की ज़मीन न निगल जाए।

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