सपने और शब्द

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मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने में अभी कुछ दिन बाकी हैं, लेकिन उसको मिले ऐतिहासिक जनादेश के तीन साल कल ही पूरे हो गए। सोलहवीं लोकसभा के लिए आम चुनाव 7 अप्रैल से 12 मई 2०14 तक 9 चरणों में हुए थे। 16 मई को हुई मतगणना के जो नतीजे आए, उन्होंने सबसे माहिर चुनाव मर्मज्ञों को भी चौंका दिया।

तीस साल बाद केंद्र में किसी पार्टी को अकेले बहुमत हासिल हुआ। बीजेपी ने 31 प्रतिशत वोट पाकर 282 सीटें हासिल की, जबकि कांग्रेस 19.3 फीसदी मतों के साथ 44 पर सिमट गई। 2०14 का जनादेश भारतीय राजनीति का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। इसके कुछ दिन पहले तक यह बात कल्पना से परे लगती थी कि केंद्र में कोई पार्टी कभी अपने दम पर सरकार बना पाएगी। गठबंधन की सियासत को भारतीय राजनीति की नियति मान लिया गया था। लेकिन 2०14 में हुआ उलटफेर इस बात का संकेत था कि जनता गठजोड़ पॉलिटिक्स से जुड़े बेरीढ़पने से उकता गई थी।

लोगों में यूपीए के कमजोर और निस्तेज नेतृत्व से निराशा 2०11 के बाद से ही जड़ जमाने लगी थी। खासकर घटक दलों के भ्रष्टाचार पर उसका मुंह ही नहीं खुलता था। ऐसे में एक स्थायी सरकार और चमकदार चेहरे वाला एक ओजस्वी नेता समय की मांग थी। नरेंद्र मोदी में लोगों को यह संभावनाएं दिखाई पड़ी।

उनके नेतृत्व में बीजेपी ने भी वक्त की नजाकत को समझा और राजनीति का मुहावरा बदला। इस तरह समाज का वह वर्ग भी बीजेपी के साथ खड़ा हुआ जो उसके मूलभूत सिद्धांतों से असहमत था, लेकिन किसी भी कीमत पर बदलाव और विकास चाहता था।

दिलचस्प बात यह कि चुनाव के बाद बीजेपी और उसके सहयोगी संगठनों ने इस जनादेश की एक और समानांतर व्याख्या भी पेश कर दी। उसका कहना था कि विकास और दृढ़ नेतृत्व जनादेश का सिर्फ एक पहलू है, इसका दूसरा पहलू यह है कि देश में हिंदू जागरण की एक लहर चल रही है। आईएसआईएस, अल कायदा और अन्य मुस्लिम आतंकी संगठनों की प्रतिक्रिया में भारत के हिंदू बीजेपी की छत्रछाया में एकजुट हो रहे हैं।

पिछले तीन वर्षों में बीजेपी ने जनादेश की इन दोनों व्याख्याओं का इस्तेमाल अपनी सुविधा के मुताबिक किया है। आज केंद्र सरकार की तमाम योजनाएं ठिठकी पड़ी हैं, युवाओं में भीषण बेरोजगारी का खौफ पैठा हुआ है। लेकिन सरकारी प्रचार तंत्र ऐसा माहौल बनाने में जुटा है, जैसे लोग बहुत खुशहाल हैं, उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं है।

तमाम देसी-विदेशी एजेंसियों के अध्ययन और आंकड़े इस बात को खारिज करते हैं, लेकिन लगातार एक के बाद दूसरी जीत दर्ज करा रही सत्तारूढ़ पार्टी इसकी परवाह भला क्यों करने लगी। मोदी सरकार अपनी कामयाबी का खूब जश्न मनाए, उसका हक बनता है। लेकिन लोगों की तकलीफों को खारिज करने की आदत अब उसे छोड़ देनी चाहिए।(आरएनएस)

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