क्रॉसओवर भारतीय सिनेमा

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चीन में फिल्म दंगल की असाधारण सफलता से साफ है कि भारतीय सिनेमा अब दुनिया के अन्य देशों की भावभूमि पर खड़ा होकर उन्हें सीधे अपील कर सकता है। भारतीय फिल्में पहले भी पूरी दुनिया में चलती रही हैं लेकिन देश से बाहर उनका मुख्य आकर्षण भारतीय मूल के दर्शकों के बीच ही देखा जाता रहा है।

लेकिन अब ऐसे कुछ संकेत मिलने लगे हैं कि भारतीय निर्देशक अपने भूगोल के बाहर के दर्शकों की भी नब्ज पकड़ सकते हैं और अपनी इस ताकत के बल पर हॉलिवुड को भी टक्कर दे सकते हैं। चीन में दंगल की कमाई भारत में इसकी कुल कमाई से भी आगे निकल जाने की पूरी संभावना है। भारत में इस फिल्म का टोटल कलेक्शन 387.38 करोड़ रुपये रहा है, जबकि बीते रविवार तक चीन में इसकी 382.69 करोड़ रुपये की कमाई दर्ज की गई।

इस तरह यह हफ्ता इस मामले में इतिहास रचने वाला है कि पहली बार कोई भारतीय फिल्म अपने देश से ज्यादा कमाई किसी अन्य देश में करेगी। आमिर खान की दंगल ने चीन में उनकी ही फिल्म पीके का रेकॉर्ड तोड़ा है जिसने वहां 1०० करोड़ रुपये कमाए थे।

भारतीय फिल्म जगत के लिए एक खुशखबरी यह भी है कि बाहुबली दो अरब डॉलर की कमाई करने वाली पहली भारतीय फिल्म बन चुकी है। हॉलिवुड ने एक ऐसी धारणा प्रचारित कर रखी थी कि विश्व स्तर पर वही फिल्म सफल हो सकती हैं जो सेक्स, हिंसा और फैंटसी पर आधारित हो और जिसका जोर लोगों को विस्मित-चमत्कृत करने पर हो।

बाहुबली में कुछ हद तक ऐसे तत्व जरूर हैं पर दंगल की कहानी तो एक अत्यंत साधारण परिवेश से उठाई गई है और बिना किसी तकनीकी तामझाम या मसाले के पर्दे पर उतार दी गई है। इससे भी बड़ी बात यह कि फिल्म का हीरो पचास वर्ष का एक अधेड़ व्यक्ति है जिसके जीवन में कोई उड़ान, कोई रोमांस नहीं है।

बस एक जिद है- जवानी का अपना टूटा हुआ सपना अपनी बेटियों के जरिए पूरा करने का, उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर का पहलवान बनाने का। एक साधारण आदमी का सपने देखना और उन्हें हकीकत में उतारने के लिए अपने समूचे परिवेश से टकरा जाना, इसके लिए अपना सब कुछ झोंक देना-इसमें कुछ चौंकाने वाला भले न हो पर यह कहानी दुनिया के किसी भी मनुष्य को छू सकती है।

दंगल इस दिशा में एक ईमानदार कोशिश है जिसे देश के बाहर भी महसूस किया जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में बॉलिवुड अपने बंधे-बंधाए दायरे से बाहर निकला है, इसकी जड़ता टूटी है। छोटे शहरों से आए निर्देशकों को इसमें स्पेस मिला है जिन्होंने नई कहानियां खोजी हैं, नए चरित्र विकसित किए हैं और बहुत कम खर्चे में भी अच्छी फिल्में बनाई हैं।

तकनीक अब कोई समस्या नहीं है क्योंकि भारतीय तकनीशनों को विदेशी विशेषज्ञों के साथ काम करने के मौके लगातार मिल रहे हैं। साफ है कि भारतीय सिनेमा अपने मुहावरे के साथ ग्लोबल हो रहा है इसके लिए उसका समझौता परस्त होना कतई जरूरी नहीं है। (आरएनएस)

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