कैशलेस इकॉनोमी के किंतु-परंतु

0
75

भरत झुनझुनवाला
सुप्रीम कोर्ट में वादों की डिजिटल दाखिले का शुभारम्भ करते समय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि डिजिटल इकॉनोमी को स्वीकार करने में लोगों की जड़ मानसिकता आड़े आ रही है। उनके वक्तव्य को दो स्तरों पर समझना होगा। एक स्तर है सफेद धन के लेनदेन का। जैसे किसी कंपनी द्वारा श्रमिकों को वेतन दिया जा रहा है अथवा इनकम टैक्स अदा किया जा रहा है।

इस प्रकार की सफेद रकम का डिजिटल लेनदेन करना निश्चित रूप से हितकारी है। इन्हें समाज सहज ही अपना भी रहा है। जैसे तमाम कंपनियों ने डिविडेन्ड को सीधे शेयरधारक के खाते में जमा करने का विकल्प पहले ही उपलब्ध कराया है। इस प्रकार के लेनदेन को डिजिटल प्लेटफार्म पर ले जाने से अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी।

मास्टरकार्ड ने अनुमान लगाया है कि कैशलेस इकॉनोमी से देश की आय में 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। क्रेडिट कार्ड कंपनी वीजा ने इस लाभ का अनुमान 7०,००० करोड़ रुपए प्रतिवर्ष लगाया है।

लेकिन दूसरी तरफ रिजर्व बैंक को घाटा लगेगा। जब आप 2,००० रुपए नगद अपनी तिजोरी में रखते हैं तो इतनी ब्याज-मुक्त रकम रिजर्व बैंक को उपलब्ध कराते हैं। पांच साल बाद रिजर्व बैंक आपको 2००० रुपए ही वापिस करेगा। यदि आपने यह रकम रिजर्व बैंक में किसी खाते में जमा कराई होती तो रिजर्व बैंक आपको लगभग 4०० रुपए ब्याज अदा करता।

एक नोट छापने का खर्च 1० रुपए मान लें तो रिजर्व बैंक के लिए कैशलेस इकॉनोमी भारी घाटे का सौदा है, चूंकि कैश पर ब्याज नहीं देना होता है। डिजिटल इकॉनोमी का अर्थव्यवस्था पर अंतिम प्रभाव फिलहाल स्पष्ट नहीं है।

कैशलेस के पक्ष में एक तर्क काले धन का दिया जा रहा है। अमेरिका ने 1969 में 1०,०००, 5,०००, 1,००० एवं 5०० डालर के नोटों को निरस्त कर दिया था। इससे नगद डालर रखने का प्रचलन कम नहीं हुआ है। आज लगभग 17०० अरब डालर के 1०० डालर के नोट प्रचलन में हैं।

इनका बड़ा हिस्सा विदेशों में पूंजी को सुरक्षित रखने के लिए किया जा रहा है। बड़े नोटों को निरस्त करने से काला धन कम नहीं हुआ है। एक अनुमान के अनुसार भारत में केवल 6 प्रतिशत काला धन नगद में रहता है। बिल्डरों के दफ्तर में आपको नगद कम ही मिलेगा। काला धन सोना, प्रापर्टी अथवा विदेशी बैकों में रखा जाता है।

कोलकाता, कानपुर एवं मुम्बई के चार्टर्ड अकाउंटेंटो एवं उद्यमियों के अनुसार नोटबंदी के बाद नं. 2 का धन्धा नगद में पूर्ववत चालू हो गया है। उद्यमी पेमेंट को कर्मियों के खाते में डलवा कर नगद निकाल कर रकम को काला बना रहे हैं। नगद में की गई बड़ी बिक्री कई छोटे-छोटे बिलों में काटी जा रही है। कैशलेस के पक्ष में दिए जाने वाले ये तर्क भ्रामक हैं।

ये तथ्य विकसित देशों को ज्ञात हैं। परन्तु वे फिर भी कैशलेस इकॉनोमी की तरफ बढ़ रहे हैं। स्वीडन तथा डेनमार्क लगभग कैशलेस हो चुके हैं। नार्वे तथा दक्षिण कोरिया 2०2० तक कैशलेस होने की तरफ बढ़ रहे है। इन देशों का कैशलेस जाने का कारण नकारात्मक ब्याज दर है।

जापान के केन्द्रीय बैंक के पास यदि आप आज 1००० येन जमा करायेंगे तो एक वर्ष के बाद आपको 999 मिलेंगे। बैंक आपकी रकम को सुरक्षित रखने का ०.1 प्रतिशत नकारात्मक ब्याज वसूल करता है। ऐसी परिस्थिति में कैशलेस लाभप्रद हो सकता है। उस परिस्थिति में यदि आपने 2,००० रुपये रिजर्व बैंक में जमा कराए होते तो रिजर्व बैंक को 4०० रुपए ब्याज अदा नहीं करना पड़ता। नोट छापने का खर्च भी बचता। नकारात्मक ब्याज दरों की स्थिति में कैशलेस इकॉनोमी लाभप्रद है।

भारत में ब्याज दरें सकारात्मक हैं, इसलिए रिजर्व बैंक को जमा रकम पर ब्याज अदा करना होगा जो कि अर्थव्यवस्था पर बोझ होगा। दूसरे, अपने देश में असंगठित क्षेत्र बहुत बड़ा है। अफगानिस्तान एवं सोमालिया जैसे देशों में अपराध नियंत्रण के लिए कैशलेस लेनदेन को बढ़ावा दिया गया है। परन्तु इससे वहां का असंगठित क्षेत्र दबाव में आया है।

विकास दर गिरी है। विकास एवं रोजगार के अभाव में आतंकवादी गतिविधियां बढ़ी हैं। अपने देश में ऐसा ही हो रहा है। तीसरे, अपने टैक्स कर्मी अतिभ्रष्ट हैं। यदि ये ईमानदार होते तो नं. 2 का धंधा होता ही नहीं। उद्यमियों द्वारा नं. 2 का धंधा अधिकतर इन कर्मियों का हिस्सा बांधने के बाद ही किया जाता है। नगद लेनदेन पर नकेल लगाने में इन कर्मियों को घूस वसूलने का एक और रास्ता उपलब्ध हो जाएगा। चौथे, भारत में सोने की ललक गहरी है।

अत: नगद पर प्रतिबंध बढऩे के साथ-साथ सोने की मांग बढ़ेगी। सम्पूर्ण विश्व में ऐसा ही हो रहा है। वर्ष 2००6 में सोने की वैश्विक सप्लाई 3252 टन थी जो 2०15 में बढ़कर 43०6 टन हो गई है। यह सप्लाई बड़ी मात्रा में भारत और चीन को जा रही है। ब्याज दर सकारात्मक होने से रिजर्व बैंक पर बोझ बढ़ेगा। असंगठित क्षेत्र दबाव में आएगा। इसी में अधिकतर रोजगार बनते हैं।

टैक्स कर्मियों का भ्रष्टाचार बढ़ेगा जैसे बैंक कर्मियों का नोटबंदी के दौरान देखा गया है। हमारे नागरिक सोने की खरीद अधिक करेंगे। यह रकम देश के बाहर चली जाएगी। अत: हमें विकसित देशों की कैशलेस चाल का अंधानुकरण नहीं करना चाहिए।

LEAVE A REPLY