सुंदर-सुवासित पुष्पों जैसी अंतर्यात्रा

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विकेश कुमार बडोला
वर्तमान मनुष्य जीवन स्वाभाविक तथा अस्वाभाविक दो भागों में विभाजित है। राष्ट्र, समाज और घर-परिवार की व्यवस्थाओं को इनके अनेक दुर्गुणों के साथ अपनाना जीवन का अस्वाभाविक पक्ष है। ममत्व, अपनत्व से पूर्ण तथा संवेदनशील मनुष्य जीवन के इस पक्ष को हृदय से स्वीकार नहीं करता। विवशता में वह ऐसी जीवन पद्धति का अंग भले बना रहे परंतु आत्मिक रूप से वह इससे बाहर आने को छटपटाता रहता है।

इसी किंकर्तव्यविमूढ़ स्थिति में उसके भीतर आध्यात्मिक भावना का विकास होता है। लेकिन आध्यात्मिक भावना बनावटी नहीं होनी चाहिए। जब हम अस्वाभाविक या अप्राकृतिक जीवन में अध्यात्म की बातें करते हैं तो यह अध्यात्म प्रवृत्ति के साथ अन्याय करने जैसा होता है। क्योंकि आध्यात्मिकता मनुष्य में भौतिक जगत से अलगाव के बाद ही उपजती है। अध्यात्म का अर्थ कोई सीखने-सिखाने का विषय नहीं। यह मनुष्य सहित सभी प्राणियों में प्राकृतिक रूप से विद्यमान है।

जब मनुष्य अपने परिवेश की प्राकृतिक घटनाओं को ध्यानपूर्वक देखने का अभ्यास करता है, उसी क्षण से उसमें अध्यात्म का भाव उत्पन्न होना आरंभ हो जाता है। अध्यात्म के शाब्दिक अर्थ पर ध्यान लगाने से ज्ञात होता है कि मनुष्य जब घर, गांव, समाज, राष्ट्र, रिश्तों के प्रभाव से मुक्त होकर मात्र अपनी आत्मिक शक्ति से संचालित होता है तो वह आध्यात्मिकता के क्षेत्र में प्रविष्ट होता है।

यह लगन मनुष्य में प्राकृतिक उपलब्धियों जैसे सूर्य, चन्द्रमा, सितारों, नील-नभ, वृक्ष-वनस्पतियों तथा प्रत्येक उस प्रकृति उपक्रम से उत्पन्न होती है, जिनका अस्तित्व और संचालन कृत्रिम न होकर पूर्णत: प्रकृति प्रदत्त होता है।
इस दुनिया की सभी नकारात्मक शक्तियां मनुष्यजनित हैं।

यदि मनुष्य प्रलोभनों, लोभ, लालच व स्वार्थ के अंधेरों में न भटकता तो उसे कृत्रिमता पर आधारित जीवन नहीं अपनाना पड़ता। इसी जगत व्यवहार के कारण मानव और प्रकृति के बीच का तारतम्य टूट गया। परिणामस्वरूप मानवीय विचार, भावनाएं तथा ज्ञान पारदर्शी न रहकर द्वंद्वात्मक हो गए। यह इसलिए हुआ क्योंकि मानव जीवन में आत्म-व्यवहार होना बंद हो गया।

हम मनुष्यों को स्वयं यह विचार करना चाहिए कि इस संसार में न तो हमारे जन्म से पूर्व हमें अपने भौतिक अस्तित्व का ज्ञान था और न ही हमारी मृत्यु के उपरांत हमें अपने भौतिक शरीर का भान होगा। तब क्यों हम अपनी स्वाभाविक वृत्ति आध्यात्मिकता से अलग हो जाते हैं।

क्यों हम अस्वाभाविक बातों व घटनाओं के प्रति आकर्षित होते हैं। इनसे मुक्त होने के प्रयास हमें करने ही होंगे। इस हेतु नियमित रूप से आत्मचिंतन किए जाने की आवश्यकता है। आत्मचिंतन से हमें जीवन-जगत के गूढ़ रहस्यों का आभास होने लगता है। हमारा जीवन भी एक प्रकार से गूढ़ रहस्य ही है।

यह अलग बात है कि भौतिक सुख-सुविधाओं अथवा दुख-दुविधाओं को भोगते हुए हमें यह अंतर्ज्ञान नहीं होता। परंतु यह भी एक तथ्य है कि हमारी वास्तविक प्रवृत्ति एक न एक दिन हमें अपनी ओर आकर्षित अवश्य करती है। यह वास्तविक प्रवृत्ति मानव का अध्यात्म बल ही है। इसका अभ्यास हमें आंतरिक व बाह्य दोनों ओर सशक्त, सुदृढ़ तथा संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की प्रेरणा देता है।

प्राकृतिक घटनाओं के प्रति ध्यानमग्न होकर अपनी आंतरिक चेतना को उन्हीं जैसा बनाना अध्यात्म का प्रथम शिक्षण कार्य है। इस आध्यात्मिक अभ्यास में जीवनभर रमण करते रहने से हमें मात्र जीवन की नकारात्मक व्याधियों से ही छुटकारा नहीं मिलता, अपितु जीवन-मृत्यु के गूढ़ रहस्य सुलझाने का एक अध्यात्म संसाधित सूत्र भी हमारे हाथ लग सकता है।

कालांतर से यह संसार मानवीय नगरों के रूप में अनेक राष्ट्रों, धर्मों व समाजों के रूप में विभक्त होता रहा है। इतने राष्ट्रों में बंटा मानव जीवन भला मतभेद बिना कैसे रह सकता था। मानव जीवन के मतभेद राष्ट्रीय स्तर पर ही नहीं धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक, व्यक्तिगत स्तर पर भी हैं। इनसे मुक्ति का प्रबल उपाय अध्यात्म ही है। कोई भी मनुष्य स्वयं के लिए आध्यात्मिक सहायता अपने अंतर्मन से संपर्क साध प्राप्त कर सकता है।

आध्यात्मिकता की अनुभूतियों से हम स्वयं का सत्य स्वरूप देख सकते हैं। इस अंतर्यात्रा में हमें जीवन सुंदर, सुवासित पुष्पों की भांति दिखने लगता है। इसके बाद हमारी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं होता और हम संसार के लिए कल्याणकारी कार्यों को करने का एक सहज स्रोत बन जाते हैं।

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