भारत के लिए मायूसी का ट्रंप काल

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एस. निहाल सिंह
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल के पहले सौ दिनों की कारगुजारी पर भारत ने भले ही आधिकारिक रूप से चुप्पी साध रखी हो, लेकिन अनेक कारणों से वास्तव में यह काल हमारे देश के लिए मायूसी भरा रहा है।

पहला, भारतीय और अमेरिकी शीर्ष नेतृत्व में कई बार हुई सीधी टेलीफोन वार्ता के बावजूद व्हाइट हाउस की निमंत्रण सूची में प्रधानमंत्री मोदी का नाम कहीं नीचे जाकर है।

दूसरा, डोनाल्ड ट्रंप ने अपने चुनावी वादे ‘अमेरिकी हित सबसे पहले’ के तहत जिन एच-1बी वीजा नियमों को कड़ा बना दिया है, उससे सबसे ज्यादा प्रभावित भारत हुआ है। तीसरा, चीन को लेकर ट्रंप की अमेरिकी नीति में एकदम उलटा बदलाव आया है और अपने हितों की खातिर वे चीन से गर्माहट भरे संबंध बनाने लगे हैं।

जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे ट्रंप काल में आने वाले पहले आधिकारिक विदेशी मेहमान बने हैं। फ्लोरिडा के एक रिट्रीट में हुई भेंट के दौरान गोल्फ के खेल में इन दोनों की रुचि के चलते यह मुलाकात काफी प्रभावशाली रही है।

डोनाल्ड ट्रंप के अन्य आरंभिक आधिकारिक मेहमानों में ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे और जर्मनी की प्रधानमंत्री एंजेला मार्केल रही हैं। जहां ट्रंप यूरोपियन यूनियन से किनारा करने के लिए मे की पीठ थपथपाते नजर आए वहीं टेलीविजन कैमरों के सामने भले ही उन्होंने मार्केल से गर्मजोशी से हाथ मिलाया लेकिन कुल मिलाकर इनकी भेंट ठंडी ही रही।

मेहमानों की सूची में इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेत्नयाहू का नाम ऊपरी स्थानों में एक रहा है, यहां तक कि फिलीस्तीन प्रशासन प्राधिकरण के अध्यक्ष महमूद अब्बास भी इनमें एक रहे हैं। ट्रंप के दामाद जारेड कुशनर, अब उनके आधिकारिक सलाहकार भी हैं और यहूदी धर्म के रब्बी प्रारूप के उपासक हैं।

उन्होंने इस्राइली और फिलीस्तीनी नेताओं को शायद इस भ्रम में मेहमानों की सूची में साथ-साथ रखा है कि शायद इससे यह जटिल समस्या हल होने में मदद मिल जाए।

मिस्र के राष्ट्रपति अल-सिस्तानी को दिए गए निमंत्रण की वजह से अनेक लोगों की भौंहें उठ गई थीं वहीं तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्डोगन, जिन्होंने हजारों राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल रखा है और जिन्हें मामूली बढ़त से जीतने के बाद न केवल पिछले अमेरिकी प्रशासन की ओर से बधाई संदेश मिले थे, अब ट्रंप से मिलने के लिए निमंत्रण भी भेजा गया है।

भारतीय आईटी कंपनियों को वार्षिक एच-1बी वीजा कोटे का लगभग 7० प्रतिशत हिस्सा मिलता आया है। अब इन्हें जारी करने वाली कंपनियों को प्रवासियों को ज्यादा तनख्वाह देने के अलावा इनके औचित्य को सिद्ध करना होगा।

ट्रंप प्रशासन का आरोप है कि भारतीय कंपनियां वीजा प्रणाली में हेराफेरी करती आई हैं। हालांकि कंपनियां इससे साफ इनकार करती हैं। भारतीय आईटी कंपनियां अब अपना साम्राज्य बचाने के लिए अन्य उपाय खोज रही हैं, जिनमें स्थानीय अमेरिकी लोगों को अधिक नौकरियां देना भी शामिल है।

जिस तेजी से ट्रंप ने हमें नजरअंदाज किया है, उससे भारत में काफी हैरानी है। अपने चुनावी प्रचार में अमेरिका में रह रहे भारतीय मूल के लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए ट्रंप ने न सिर्फ 2०14 के लोकसभा चुनाव में लगे नारे ‘अबकी बार-मोदी सरकार’ की तर्ज पर ‘अबकी बार-ट्रंप सरकार’ को बड़े जोशो-खरोश से दोहराया था बल्कि ‘हिंदू भारत’ की भरपूर श्लाघा भी की थी, जो कि उनके लिए बहु-संप्रदाय वाले हमारे देश का समानवाची शब्द था।

लेकिन जिस तरह चीन को लेकर राष्ट्रपति ट्रंप ने गुलाटी मारी है वह सच में बहुत हैरान करने वाली है। उनके चुनाव प्रचार का एक स्थाई मुद्दा चीन-निंदा अवश्य हुआ करता था।

तब वे चीन पर मुद्रा अवमूल्यन-हेराफेरी करने के अलावा ‘वन चाईना'(संयुक्त चीन) नीति को लेकर काफी तल्ख हुआ करते थे लेकिन अब वही ट्रंप हैं, जिन्होंने राष्ट्रपति पद संभालने के बाद न केवल अपने चीनी समकक्ष शी जिनपिंग के साथ हुई पहली टेलीफोन वार्ता में उसी ‘संयुक्त चीन’ नीति को मान्यता दी थी, बल्कि फ्लोरिडा के रिट्रीट में उनकी आवभगत भी जमकर की है।

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