नवाज की दुखती रग पर सेना का हाथ

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विवेक काटजू
पाकिस्तान के नये बनने वाले जनरलों को जल्द ही यह एहसास होने लगता है कि उन्हें अपने देश के राजनीतिक नेतृत्व को यह कड़ा संदेश देने की आवश्यकता है कि वे सेना की गरिमा से खिलवाड़ की कोशिश न करें। साथ ही वे भारत सरकार को संकेत भी देते हैं कि मामला जब पाकिस्तान की भारत के प्रति विदेश नीति का होगा तो अंतिम निर्णय सेनाध्यक्ष के हाथ रहेगा। जनरल कमर बाजवा, जिन्होंने पांच महीने पहले अपना पद संभाला है, वे भी इस प्रवृत्ति के अपवाद नहीं हैं।

पिछले साल अक्तूबर माह में ‘द डॉन’ नामक अखबार में यह खबर छपी थी कि एक उच्चस्तरीय बैठक, जिसमें प्रधानमंत्री नवाज शरीफ, उनके छोटे भाई और पंजाब प्रांत के शक्तिशाली मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने भाग लिया था, में आईएसआई महानिदेशक को झाड़ लगाई थी कि क्यों उनका विभाग सुरक्षा एजेंसियों पर पकड़े आतंकवादियों को छोडऩे का दबाव बनाता है। उसी बैठक में तत्कालीन विदेश सचिव ने कहा था कि कैसे आतंकवादी गुटों जैसे कि लश्कर-ए-तैयबा, हक्कानी नेटवर्क और जैश-ए-मोहम्मद की करतूतों से अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान अलग-थलग पड़ता जा रहा है। इस खबर पर सेना बहुत लाल-पीली हुई थी, खासकर इस बैठक के ‘अतथ्यात्मक’ संवेदनशील संवाद के लीक होने पर। लेकिन असल गुस्सा तो सिविलियन सरकार से पड़ी झाड़ का था।

इस बैठक के घटनाक्रम ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को मजबूर किया कि वे जांच समिति बनाएं, जिसमें सेवानिवृत्त न्यायाधीश आमिर रजा खान के अलावा आईएसआई सहित अन्य सुरक्षा एजेंसियों के प्रतिनिधि भी लिए गए थे। गत 25 अप्रैल को इस समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी और एक दिन बाद यह प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के दफ्तर पहुंची। 29 अप्रैल को प्रधानमंत्री कार्यालय ने खुलासा किया कि नवाज शरीफ ने मंजूर किया है कि उनके प्रभावशाली विशेष सहायक तारिक फातेमी द्वारा विदेश नीति में जो बदलाव किए गए थे, उन्हें वापस लिया जा रहा है। यह भी कहा गया कि अंदरूनी बातों के लीक होने के मद्देनजर सरकार के मुख्य सूचना अधिकारी के खिलाफ माकूल कार्रवाई की जाएगी। ‘द डॉन’ में यह खबर छपने के बाद अक्तूबर माह में सूचना मंत्रालय का काम देखने वाले मंत्री ने इस्तीफा दे दिया था। जाहिर है कि समिति की यह रिपोर्ट जिसे सार्वजनिक नहीं किया गया, इसमें फातेमी और तत्कालीन सूचना अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की ताईद की गई होगी। लेकिन नवाज शरीफ द्वारा इस रिपोर्ट पर उठाए गए कदमों की खबर अभी पूरी तरह फैली भी न थी कि सेना के सूचना विभाग के महानिदेशक मेजर-जनरल आसिफ गफूर ने ट्वीट किया, ‘द डॉन में छपी खबर के मद्देनजर जो निर्णय सरकार ने लिए हैं, वे अधूरे हैं और समिति द्वारा दिए गए सुझावों के पूरी तरह अनुरूप नहीं हैं, इसलिए इन्हें खारिज किया जाता है।’

साफ है कि सेना की ऐसी त्वरित और कड़ी प्रतिक्रिया पहले से ही पनामा बैंक मामले में कानूनी तौर पर कमजोर पड़े नवाज शरीफ को और नीचे गिराने की खातिर है। प्रत्युत्तर यह जताने के लिए था कि सेना का सम्मान तभी तुष्ट होगा जब नवाज अपने किसी नजदीकी की बलि देंगे। माना जा रहा है कि नवाज शरीफ की बेटी मरियम, जिसे वे अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी के रूप में प्रशिक्षित कर रहे हैं, ने ही ‘द डॉन’ को अंदरूनी बातें लीक की हैं।

अब शरीफ व्याकुल हो उठे हैं और अपने उच्चस्तरीय सहायकों के साथ मिलकर इस नयी मुसीबत से निकलने का रास्ता खोजने में लगे हुए हैं। हालांकि इस बात की संभावना कम ही है कि सेनाध्यक्ष बाजवा एक बड़ी कीमत वसूले बगैर नवाज शरीफ को आसानी से भागने का कोई रास्ता दे देंगे। पाकिस्तानी सेना के कोर कमांडर और प्रमुख स्टाफ अधिकारी समय-समय पर सेनाध्यक्ष की सदारत में बैठकें करते रहते हैं, जिसमें न केवल सैन्य मामलों बल्कि अन्य महत्वपूर्ण मामलों पर भी विचार-विमर्श किया जाता है। दरअसल सेना खुद को पाकिस्तान के सिद्धांतों का स्वघोषित संरक्षक समझती है।

तथापि शरीफ-बंधुओं द्वारा पनामा बैंकों में रखे कथित काले धन के मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की चर्चा सेना की मीटिंग में होना खुद इसकी स्थापित विषय सूची से अलग एक अप्रत्याशित घटना है। गत 24 अप्रैल को मेजर जनरल गफूर ने अपने एक अन्य ट्वीट में बताया था कि सेना की बैठक में पनामा केस पर आए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय और एक संयुक्त जांच समिति (जेईटी) बनाने की सिफारिश पर भी चर्चा हुई है। यह मंच अहद करता है कि हमारा संस्थान जेईटी में अपने प्रतिनिधियों की मार्फत देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सेना पर जताए गए भरोसे पर खरा उतरने की खातिर अपनी भूमिका कानून-सम्मत और पारदर्शी तरीके से निभाएगा। ऐसा कहकर न्यायालय द्वारा जेआईटी बनाने के निर्णय में आईएसआई और मिलिट्री इंटेलिजेंस को जबरदस्ती शामिल कर दिया है।

वास्तव में कुलभूषण जाधव को सुनाई गई मौत की सजा की ताईद जनरल बाजवा द्वारा 11 अप्रैल को करना और 1 मई को भारतीय सेना के परमजीत सिंह और बीएसएफ के हेड-कांस्टेबल प्रेम सागर की देह अंग-भंग करने की बर्बरता भारत-पाक संबंधों की बिसात के अंतर्गत आते हैं। इन दोनों जवानों को हमारे क्षेत्र में घुसकर पाकिस्तानी सेना के बॉर्डर एक्शन ग्रुप ने शहीद किया है। महत्वपूर्ण यह है कि इस नृशंस घटना से एक दिन पहले ही जनरल बाजवा ने वास्तविक सीमा रेखा का दौरा किया था, जहां उन्होंने भारत पर कश्मीर में राजकीय आतंकवाद चलाने का आरोप जड़ा था। साफ है कि अपने इन कृत्यों से बाजवा यह सुनिश्चित करना चाह रहे हैं अपने एवं नवाज़ शरीफ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं नवाज़ शरीफ के बीच आपसी विवादों को सुलझाने की खातिर होने वाली वार्ताओं पर अड़ंगा बरकरार रहे।

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