जिंदगी सरीखा यह सफर

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महेश बारमटे ‘माही’
कई बार ऐसा होता है कि हम लिखते हैं, लिखे को याद करते हैं या फिर याद करने के लिए लिखते हैं। वैसे ही जैसे रोज हम कुछ सफर तय करते हैं। इस सफर को कई लोग बेहद सपाट तरीके से तय करते हैं। उन्हें पसंद भी नहीं होता कंफर्ट जोन से बाहर निकलना। आज यह जोन कंफर्ट तो कल वह वाला। पीछे का भूलो। आगे की सोचो। कुछ मामलों में यह अच्छा भी है।

बात उन दिनों की है जब कभी-कभार घर चलते वक्त देर हो जाती थी। मैं सोच रहा था कि आखिर ये बुरे दिन कब जायेंगे। मैं अपनी बाइक से ऑफिस से घर की ओर आ रहा था। बरसात के दिन थे तो रास्ते बहुत खऱाब हो गए थे। जो सफऱ मैं 15 मिनट में तय करता था, आज उसमें 30 मिनट से भी ज्यादा वक्त लग रहा था। जब मैं अपनी समस्याओं के बारे में सोच रहा था तभी अचानक ये ख्याल आया कि जि़न्दगी भी तो कुछ इसी रास्ते की तरह ही है। कहीं बिल्कुल सीधी और सपाट सड़क, कहीं उबडख़ाबड़ टूटी हुई सड़क, कहीं हद से ज्यादा तीखा मोड़ लिए हुए तो कहीं कुछ और। अगर टूटी उबडख़ाबड़ सड़क होती है तो संभल कर चलते हैं। पल-पल में अपनी गति और दिशा बदलते रहते हैं। अगर सड़क सपाट है तो भी हम अपनी गति और छोटे-मोटे गड्ढों से खुद को बचाते या सब कुछ इग्नोर करते हुए प्रतिदिन अपनी मंजिल तक पहुंचते हैं।
सफऱ छोटा हो या बड़ा, हम हर दिन एक मंजिल तय करते हैं। रोज ऑफिस जाना या ऑफिस से घर जाना। सड़क भी वही है पर हर रोज उसी सड़क पर एक ही स्पीड से, एक ही तरीके से तो नहीं चलता मैं। हर रोज एक नए गड्ढे को इग्नोर करता हूं, कुछ अवरोधों से बचता हूं। नये मुसाफिरों को देखता हूं। फिर जाकर वही रोज वाला सफऱ तय करता हूं।

अब इस सफऱ को जि़न्दगी मान लूं तो कुछ अवरोध या गड्ढे जिनसे मैं बचता हूं, वो दुख हैं, जिनसे खुद को बचाता हूं। कुछ गड्ढों को इग्नोर करते हुए मैं गाड़ी चलाता जाता हूं। वो ऐसे दुख हैं, जिनको इग्नोर कर देने से सफऱ में ज्यादा दर्द नहीं होता। सीधी सपाट रोड में भी तो मैं गाड़ी सीधी एक लकीर में नहीं चला पाता। तो कैसे मान लूं कि जि़न्दगी जो बिल्कुल दर्दरहित है, वो भी बिना रास्ते से पल दो पल के लिए भटके ही गुजर जायेगी।

इस सफऱ ने मुझे जि़न्दगी का एक पाठ सिखा दिया है कि जि़न्दगी सिर्फ सुख भरी नहीं है। इसमें दुख हैं, मोड़ हैं, रुकावटें हैं। अब ये बात अलग है कि इन दुखों को इग्नोर करना है, स्पीड मेनटेन करके चलना है या जो हो रहा है, उसे होते रहने देना है। जिस तरह रोड खऱाब होने पर हम शासन को दोष देते हैं, उसी तरह जीवन के कुछ पल दुखदायी होने पर भगवान को दोष देते हैं। बस हममें सही फैसला लेने का दम होना चाहिए। सफऱ अनजान ही सही, आखिर कट ही जाता है। बिल्कुल जि़न्दगी की तरह।

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