चोर-सिपाही और चूहे

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अरुणेन्द्र नाथ वर्मा
कहां अखबारी खबरें और कहां गज़़ल साम्राज्ञी बेगम अख्तर की गज़़लें, जिन्हें सुनकर लगता है कि स्वर और शब्द उनके गले से नहीं बल्कि सीधे उनकी आत्मा से निकलते हैं। लेकिन उस दिन मेरे एक दोस्त अखबार में एक चालू किस्म की खबर पढ़कर इतने भावुक हो गए कि बेगम साहिबा की एक गज़़ल उनके कानों में गूंजने लगी। गज़़ल के शब्दों और सुरों से भी ज़्यादा दर्द मेरे दोस्त की आवाज़ में छलक आया।

ठंडी आहें भरते हुए बोले ‘इस गज़़ल के शायर अली अहमद जलीली इसे लिखते हुए और बेगम साहिबा इसे गाते हुए वैसी ही भयानक मानसिक यंत्रणा से गुजऱे होंगे, जिससे होकर बिहार पुलिस को पिछले दिनों गुजऱना पड़ा। मद्यनिषेध का नया कानून सख्ती से लागू करने के सिलसिले में उसके कर्मचारियों को सैकड़ों जगहों छापे मारने पड़े, हज़ारों गिरफ्तारियां करनी पड़ीं और लाखों लीटर शराब ज़ब्त करनी पड़ी। जिनकी शराब ज़ब्त हो गयी वे तो किसी तरह दिल पर पत्थर रखकर उसे भुला भी लेंगे, लेकिन जिन थानों के मालखानों में ये बोतलें जमा की गयीं उनके कर्मचारियों के दिल पर क्या गुजऱी होगी। हीर आंखों से दूर हो तो बात और है, लेकिन उसे कैद में डालकर रांझे को ही पहरे पर बिठा देने से बढ़कर निर्दयता क्या हो सकती है। जिस माल में उनके हक़ का हिस्सा कल तक उनके घर पहुंच जाता था। आज सरकारी मालखाने में जमा करके उसी पर पहरा देते हुए कितने दर्द भरे गीत उनके होंठों पर तड़प जाते होंगे।’

मैंने कहा, ‘शराब के गुणगान करने वाले जाने कितने फि़ल्मी गीत मैंने सुने हैं। लेकिन मद्यनिषेध को लेकर लिखी हुई किसी गज़़ल से तो मैं परिचित नहीं हूं।’ वे बोले, ‘कभी उस गज़़ल की गहराई में जाओ जिसका उन्वान है—अब छलकते हुए सागर नहीं देखे जाते, तौबा के बाद ये मंजऱ नहीं देखे जाते। फिर मेरी बात समझोगे। जऱा सोचो, पुलिस और आबकारी जैसे जिंदादिल विभागों के कर्मचारियों के दिलों पर कैसी चोट लगी होगी जब अचानक वैध से अवैध बन गयी सारी शराब जब्त करके सरकारी मालखानों में जमा कराने का आदेश मिला होगा। वह तो खैरियत है कि सारा ज़ब्त माल चूहे हज़म कर गए।’
मैंने कहा—कहीं चूहे भी ऐसा कर सकते हैं।

वे बोले—गज़़ल के अगले शेर से पुलिस विभाग और चूहे, दोनों को, प्रेरणा मिली होगी। तुम्हें पता है न रह्जऩो-रहबर का अर्थ है लुटेरे और साथ के मुसाफिर। तो उस गज़़ल का अगला शेर सुनो—’साथ हर एक को इस राह में चलना होगा, इश्क में रह्जऩो–रहबर नहीं देखे जाते। अब छलकते हुए सागऱ नहीं देखे जाते! (आरएनएस)

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