आंतरिक लोकतंत्र की दरकार

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आखिरकार बसपा सुप्रीमो मायावती ने पार्टी के कद्दावर नेता और तीन दशक तक पार्टी में जिम्मेदारी संभालने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। आर्थिक अनियमितताओं के आरोप -प्रत्यारोप दोनों ही नेताओं ने एक -दूसरे पर लगाये। आखिर ये आरोप पार्टी में तीन दशक रहने के दौरान पार्टी सुप्रीमो ने क्यों नहीं लगाये।

बहरहाल मायावती ने सिद्दीकी पर भयादोहन से धन अर्जित करने का आरोप भी लगाया। कद्दावर होते नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाना मायावती का शगल रहा है। उन्होंने पार्टी में चेहरे तो रखे, परन्तु उन्हें नेता नहीं बनने दिया। निरंकुश साम्राज्ञी की तरह व्यवहार करते हुए पहले मुख्यमंत्री-काल के दौरान 26 प्रभावशाली नेताओं को बाहर का रास्ता दिखाया, जिनमें 13 मंत्री, मंत्री जैसा दर्जा पाये नेता, सांसद व विधायक थे। अखिलेश सरकार के दौरान नेता प्रतिपक्ष रहे स्वामी प्रसाद मौर्य बसपा छोड़कर भाजपा में चले गये थे। पिछले लोकसभा चुनाव में बसपा को एक?भी सीट नहीं मिली और इस साल के विधानसभा चुनाव में इतने ही विधायक चुने जा सके जो विधान परिषद व राज्यसभा में एक प्रतिनिधि भेजने लायक भी नहीं हैं। फिर भी न तो बहनजी के तेवर ढीले हुए और न ही पार्टी में उठापटक ही थमी।

शुरुआती दौर से ही बसपा में आर्थिक लेनदेन को लेकर विवाद खड़े होते रहे हैं। जो भी नेता पार्टी छोड़कर जाता है, पार्टी में टिकट से पद वितरण तक मोटी धनराशि के लेनदेन का आरोप लगाता है। स्वामी प्रसाद मौर्य ने भी और नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने भी ऐसे ही आरोप लगाये। नोटबंदी के दौरान पार्टी द्वारा अर्जित धनराशि को लेकर भी सवाल उठे। एक महत्वपूर्ण वजह यह भी है बसपा में आंतरिक लोकतंत्र का पूरी तरह अभाव नजर ?आता है। मायावती ने अपने करीब दूसरी पंक्ति का नेतृत्व विकसित होने ही नहीं दिया। उनके चंद विश्वासपात्र ही वित्तीय लेनदेन का भार संभालते रहे और गाहे-बगाहे वित्तीय अिनयमितताओं के आरोप लगते रहे।

उ.प्र. में मायावती के मुख्यमंत्री रहते हुए भी नसीमुद्दीन पर लोकायुक्त ने बेनामी संस्थाओं के जरिये जमीन-जायदाद खरीदने का आरोप लगाया था। बहरहाल, बसपा के मुश्किल दौर में दिग्गज नेताओं की पार्टी से विदाई संगठन के लिये चिंता की बात होनी चाहिए। खासकर कांशीराम के समय से सक्रिय और उ.प्र. में पार्टी का मुस्लिम चेहरा माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी की विदाई के बाद। इससे बसपा के जनाधार दलित, पिछड़ा व मुस्लिम समीकरण के गड़बड़ाने का खतरा भी है। पार्टी में अब ऐसे लोगों का अभाव-सा नजर आता है जो जनाधार के साथ अपनी पहचान भी रखते हों।(आरएनएस)

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