खुशियों की चाबी है सकारात्मक सोच

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योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’
नियति ने पूरी सृष्टि में द्वैत की स्थिति बना रखी है, शायद इसलिए कि हम सही और गलत के बीच चुनाव करना सीख सकें। जहां प्रकृति में सुबह होती है तो पूर्व दिशा से उषा की लालिमा के बीच प्रकाशपुंज लेकर सूर्य उदित होता है और पूरी सृष्टि कर्मशील होकर ‘सृजन’ में जुट जाती है। वहीं जब संध्या आती है तो सूर्य अस्ताचल में चला जाता है और अन्धकार का साम्राज्य फैल जाता है। इसी तरह जीवन में उजाला और अन्धकार साथ-साथ चलते हैं, तो सत्य और असत्य, श्वेत और श्याम, न्याय और अन्याय के साथ ही सकारात्मक और नकारात्मक चिंतन भी साथ-साथ चलते हैं।

अकसर अस्ति और नास्ति के कारण संसार में ईश्वर के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिन्ह लगाने वाले पैदा हो जाते हैं। जो ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, उन्हें हम आस्तिक कहते हैं और जो ईश्वर के अस्तित्व को नहीं मानते, वे नास्तिक कहे जाते हैं। क्या इसका अर्थ यह हुआ कि ईश्वर या फिर सृष्टि का नियमन करने वाली कोई अदृश्य शक्ति कहीं है ही नहीं?

मनोविज्ञान कहता है कि सृष्टि में व्यक्तित्व के तीन स्तर होते हैं, जिनमे एक है इद , दूसरा है अहं और तीसरा है पराह्म। इनमें से पहला यानी इद है सुख-तत्व, जो सृष्टि के प्रत्येक जीवधारी में होता है। चींटी से लेकर हाथी तक और मनुष्य से लेकर प्रत्येक पशु, पक्षी, जलचर एवं प्राणधारी सुख की अनुभूति करता ही है। जरा सा दु:ख होते ही वह तड़पने लगता है। दूसरा अहं अर्थात ईगो बुद्धिधारियों यानी समस्त मनुष्यों में होता है, जिसमें संकल्प और विकल्प साथ-साथ रहते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति अपने अहम को उदात्त बना लेता है तो उसे पराह्म यानी सुपर ईगो कहा जाता है। जो केवल संकल्प लेकर चलता है, उसमें कोई भी विकल्प यानी दुविधा कभी नहीं होती।

हमारे जीवन को सुखी या दुखी बनाने का सारा दारोमदार इस अहं पर ही होता है। एक बोध-कथा के अनुसार एक पति और पत्नी बड़े प्रेम से रहते थे, लेकिन अनायास ही पति को कुछ व्यस्तता आ गई और वे पत्नी से कुछ दूर से रहने लगे। उधर पत्नी को लगा कि कहीं पतिदेव मुझसे ऊब तो नहीं गए। दोनों बिना कुछ कहे अपने-अपने मन के संकल्प और विकल्प में फंसते गए और उनका आपस में बोलना तक बंद हो गया। आखिर एक दिन पत्नी ने पति से कहा कि वे उसकी कोई छह कमियां बताएं, जिन्हें सुधार कर वह एक अच्छी पत्नी बन सके। पति ने जब यह सुना तो असमंजस में पड़ गया और सोचने लगा कि मैं बड़ी आसानी से इसकी छह कमियां क्या, साठ कमियां बता सकता हूं, लेकिन मैंने तो कभी यह सोचा ही नहीं।

पति ने कहा कि तुम मुझे आज शाम तक का समय दे दो, मैं दफ्तर से लौटकर तुम्हें जरूर बताऊंगा। दफ्तर पहुंचकर पति ने एक फूल वाले को कहा कि मेरी लिखी चिट्ठी के साथ मेरी पत्नी को छह लाल गुलाब भिजवा दो। चिट्ठी में पति ने लिखा था-तुम्हारी छह क्या, एक भी ऐसी कमी मुझे मालूम नहीं है जो मैं तुम्हें लिख सकूं। शाम को जब पति घर पहुंचा तो देखा कि पत्नी दरवाज़े पर खड़ी उसका इंतज़ार कर रही थी और उसकी आंखों में ख़ुशी के आंसू भरे हुए थे।
यह बोध-कथा आज बेहद प्रासंगिक हो गई है। हम अपने जीवन में हर समय, किसी न किसी की कमियां ही ढूंढ़ते रहते हैं, लेकिन कभी यह नहीं सोचते कि मुझमें कितनी कमियां हैं? क्या कमियों को ढूंढऩे से ही हम अपने जीवन को नरक नहीं बना रहे हैं? कबीर ने तो सारी दुनिया से कहा है-

बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्या कोय!
जब घर देखा आपना, मुझसे बुरा न कोय!!

जरा सोचिए, अगर पति अपनी पत्नी की कमियां ढूंढने लगते तो क्या उनका दाम्पत्य-जीवन सुखद रह पाता? बस, यही है सकारात्मक सोच का सुफल कि हम अपने जीवन को नरक बनने से बचा लेते हैं। जाने क्यों, हम एक तरफ तो ऊंची-ऊंची डिग्रियां लेकर स्वयं को बहुत पढ़ा-लिखा और विद्वान कहते हैं, लेकिन हमारे भीतर की नकारात्मक सोच निरंतर बढ़ती जाती है। हम जऱा-जरा सी बात पर उत्तेजित होकर दूसरों की कमियां गिनाने लगते हैं, जबकि हमारे भीतर उनसे भी ज्यादा कमियां होती हैं!

वास्तव में नकारात्मक चिंतन से हम स्वयं को तो अंधेरे में धकेलते ही हैं, साथ ही अपने आसपास के वातावरण को भी वैचारिक प्रदूषण से खऱाब कर देते हैं। हमें आज केवल दूसरों की अच्छाइयां देखना आ जाए तो हम खुद के और दूसरों के जीवन को भी खुशगवार बना सकते हैं। मत कीजिए शिकायत कि सब कुछ खराब है, बस जरा अपनी दृष्टि सकारात्मक बना लीजिए और फिर देखिए, आपको चारों तरफ उजाला ही उजाला दिखाई देने लगेगा।

सीखें अगर कृतज्ञता, पाएंगे नित मान!
मन पवित्र हो जाएगा, याद करें अहसान!!

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