संग्रहालय में जीवंत स्मृतियों की टीस

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विश्वनाथ सचदेव
कुछ अर्सा पहले राजकोट जाने का अवसर मिला। तब देखा था अल्फ्रेडहाई स्कूल। स्कूल दिखाते हुए मेज़बान मित्र ने जब यह बताया कि गांधीजी ने सात साल तक इस स्कूल में पढ़ाई की थी तो अनायास ही उस इमारत का महत्व मेरी निगाह में और बढ़ गया था। तब यह भी पता चला कि आज़ादी पाने के बाद इस स्कूल का नाम महात्मा गांधी के नाम पर रख दिया गया है। अंग्रेज़ों के ज़माने में यह सौराष्ट्र का अंग्रेजी माध्यम वाला पहला स्कूल था, अब शिक्षा का माध्यम गुजराती कर दिया गया है। मेरे मेज़बान ने यह भी बताया था कि इस स्कूल में पढऩे वाले छात्र इस गौरव के साथ जीते हैं कि उनके स्कूल में कभी राष्ट्रपिता पढ़ा करते थे

पर अब शायद ही कोई छात्र इस गर्व का एहसास कर पायेगा क्योंकि राज्य सरकार ने इस स्कूल को बंद करके इस इमारत को एक संग्रहालय का रूप देने का निर्णय कर लिया है। इस आशय का समाचार पढ़कर मुझे झटका-सा लगा था। और यह बात और पीड़ा देने वाली थी कि यह निर्णय स्कूल में पढऩे आने वाले छात्रों की लगातार कम होती संख्या के कारण लेना पड़ा है। गुजरात की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले शहर के इस गुजराती माध्यम वाले स्कूल के जिन विद्यार्थियों को दूसरे स्कूलों में जाकर पढऩे के निर्देश दिये गये हैं, उनकी कुल संख्या 125 है। अर्थात इस समय स्कूल में मात्र 125 छात्र पढ़ रहे थे। अब कोई नहीं पढ़ेगा। पिछले कुछ सालों में अंग्रेज़ी माध्यम के लालच में विद्यार्थी लगातार यह स्कूल छोड़कर अन्यत्र जा रहे थे। इस प्रक्रिया से गुजऱने वाला यह अकेला स्कूल नहीं है। गुजरात समेत देश के अनेक राज्यों में भारतीय भाषाओं के माध्यम से शिक्षा देने वाले स्कूलों में छात्रों की संख्या लगातार कम हो रही है। परिणामस्वरूप, या तो ऐसे स्कूल बंद हो रहे हैं या फिर माध्यम बदल कर अंग्रेज़ी किया जा रहा है।

अल्फ्रेडहाई स्कूल या महात्मा गांधी उच्च विद्यालय में भी शिक्षा का माध्यम बदला जा सकता था, पता नहीं क्यों शिक्षा विभाग ने ऐसा क्यों नहीं किया। लेकिन यह भी समझ नहीं आ रहा कि एक अच्छे-भले स्कूल को म्यूजियम बनाने का निर्णय क्यों लिया गया है। सुना है दस करोड़ रुपये स्वीकृत किये गये हैं इस म्यूजियम को बनाने के लिए। और यह सब गांधीजी की स्मृति के नाम पर हो रहा है। महापुरुषों की स्मृति को बनाये रखने के लिए उनसे जुड़े आवासों को म्यूजियम बनाने का एक फार्मूला ही अपना लिया है हम लोगों ने। पर क्या यह सही तरीका है किसी महापुरुष की स्मृति को जीवित रखने का?

संग्रहालयों का महत्व कम नहीं होता। महापुरुषों के नाम से बने संग्रहालय एक जीवित इतिहास बन जाते हैं। इन संग्रहालयों में उनसे जुड़ी चीज़ें देखकर उनसे जुडऩे का एक एहसास आने वाली पीढिय़ों को मिलता है। मुझे याद है बचपन में पोरबंदर की यात्रा के दौरान जब मेरे पिता उस मकान को दिखाने ले गये थे, जहां गांधीजी जन्मे थे, तो बापू के पढऩे का छोटा-सा कमरा देखकर मुझे लगा था जैसे मैं भी वहां बापू के साथ बैठकर पढ़ रहा हूं। उस पल का वह रोमांच आज भी सिहरन पैदा कर देता है। लेकिन, पता नहीं क्यों, मुझे राजकोट के गांधीजी वाले अल्फ्रेड स्कूल का बंद होना असहज बना रहा है।

यह कहना कि मैं वह स्कूल देख आया हूं जहां कभी गांधीजी पढ़ते थे, और यह कह पाना कि जिस कक्षा में मैं पढ़ता हूं, उसमें कभी गांधीजी पढ़ा करते थे, बहुत बड़ा अंतर है दोनों वाक्यों में। लेकिन, बात एक एहसास को जीवित रखने की ही नहीं है। राजकोट के अल्फ्रेड स्कूल का बंद होना और भी कई सारे सवाल उठा रहा है। क्यों गुजरात सरकार एक ऐसे स्कूल को चलाने में विफल रही, जिसका अपना ऐतिहासिक महत्व भी है? क्यों आज हमारे बच्चे, बच्चों से ज़्यादा उनके अभिभावक, अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूलों को ज़रूरी मानने लगे हैं? क्यों किसी के दिमाग़ में यह बात नहीं आयी कि गांधीजी के इस स्कूल को गांधीजी द्वारा प्रारंभ की गयी शिक्षा-पद्धति की सफल प्रयोगशाला बना दिया जाये?

गांधीजी ने बुनियादी शिक्षा की बात की थी। जीवन की हर प्रकार की ज़रूरत को पूरा करने वाली प्रशिक्षण देने वाली शिक्षा के पक्षधर थे वे। कोई ज़रूरी नहीं कि बुनियादी शिक्षा के उन्हीं-उन्हीं मुद्दों के आधार पर शिक्षा दी जाये जो गांधीजी ने उठाये थे। उसे नयी ज़रूरतों के अनुरूप ढाला जा सकता है। अल्फ्रेड स्कूल एक अच्छी प्रयोगशाला बन सकता था गांधीजी की सुझायी शिक्षा-पद्धति का। बनना चाहिए था इसे ऐसी प्रयोगशाला लेकिन यह बात किसी ने सोची नहीं। म्यूजिय़म बनाने की बात सोच ली।

यह दुर्भाग्य ही है कि गांधीजी को हमने म्यूजिय़म में रखी जाने वाली चीज़ बना दिया है। या फिर पूजा की। ये दोनों ही बातें नहीं होनी चाहिए थीं-न गांधीजी एक बीता हुआ कल हैं और न ही किसी मंदिर में पूजा जाने वाला भगवान। गांधीजी एक जीती-जागती सोच का नाम है। दो साल बाद दुनिया गांधीजीका डेढ़ सौवां साल मनायेगी। तैयारियां अभी से शुरू हो गयी हैं। एक तैयारी इस बात की भी होनी चाहिए कि कोई अल्फ्रेड स्कूल बंद करके उसे स्मारक बनाने की नौबत न आये।

इस तथ्य पर गौर किये जाने की ज़रूरत है कि अल्फ्रेड स्कूल में शिक्षा का माध्यम गुजराती था, इसलिए वहां विद्यार्थियों की संख्या कम हो रही थी। अंग्रेज़ी माध्यम वाले स्कूल अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए अनिवार्य लगने लगे हैं। अब स्कूल में दाखिले से पहले बच्चों को अंग्रेज़ी बोलना सिखाना पड़ता है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे हिंदी भाषी राज्यों में भी पहली कक्षा में अंग्रेज़ी माध्यम की शिक्षा दी जा रही है।

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