लौकिक-पारलौकिक मुक्ति के पथ प्रदर्शक

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निरंकार सिंह
आज भी बुद्ध एशिया की आवाज और विश्व के साकार विवेक हैं। उनका जीवन दर्शन और उनके नैतिक उपदेश विज्ञान के प्रेमी आधुनिक विचारकों को भी बहुत सुहाते हैं क्योंकि उनका दृष्टिकोण तर्कपूर्ण और अनुभवपरक है। उन्होंने भारतीय समाज के जाति भेद को नहीं माना। उनके धर्म और दर्शन का द्वार सबके लिए खुला है।

बुद्ध के अनुयायी परम उत्साही और धर्म प्रचार की भावना से ओतप्रोत थे। विविध धर्मों के अनुयायियों में, अपने मूल संघ के सीमित क्षेत्र से संतुष्ट न रह सकने वाले लोगों में वे प्रथम थे। वे बहुत दूर-दूर तक फैल गये। उन्होंने पश्चिम, उत्तर दक्षिण की यात्रा की। वे तिब्बत, ईरान, तुर्की, रूस, पोलैण्ड तथा पश्चिमी जगत के अनेक देशों में गये। वे चीन, कोरिया और जापान गये। वे बर्मा, श्याम और ईस्टइण्डीज तथा उसके आगे तक गये।

आज से लगभग 26०० वर्ष पूर्व वैशाख माह की पूर्णिमा बुद्ध के जीवन की तीन महत्वपूर्ण घटनाओं से अर्थात बुद्ध के जन्म, बोध प्राप्ति और परिनिर्वाण से जुड़ी है। बुद्ध ने जिस समय जन्म लिया था, उस समय समाज ऊंच-नीच की परम्परागत रूढिय़ों और अनेक तरह के प्रपंचों, अन्धविश्वासों में जकड़ा हुआ था। उन्होंने धर्म के तत्कालीन ठेकेदारों, पुरोहितों को चुनौती दी। पुरोहितों ने वेदों को रहस्य बना रखा था-उन वेदों को, जिनमें प्राचीन हिन्दुओं द्वारा खोजे आध्यात्मिक सत्य संचित हैं।

बुद्ध के पास तीव्र मस्तिष्क, यथेष्ट शक्ति और आकाश जैसा असीम हृदय था। वह किसी पर अपना शक्तिपूर्ण अधिकार नहीं चाहते थे। वह मनुष्यों के मानसिक और आध्यात्मिक पाशों को तोड़ डालना चाहते थे। बुद्ध के पास आत्माओं के पाशों को तोड़ फेंकने वाले उपायों को खोज निकालने वाला मस्तिष्क था। उन्होंने जान लिया कि मनुष्य दुख से पीडि़त क्यों होता है और उन्होंने दुख से निवृत्त होने का मार्ग ढूंढ निकाला।

बुद्ध ने हमें प्रज्ञा और करुणा का उपदेश दिया। हमारी परख उन मतों से, जिनका हम अनुसरण करते हैं या उन नामों से, जिन्हें हम धारण करते हैं या उन नारों से जिन्हें हम चिल्ला-चिल्लाकर कहते हैं, नहीं होगी, बल्कि हमारे परोपकार के कामों से और भातृ भावना से होगी। आदमी की कमजोरी यह है कि जरा, रोग और मृत्यु के अधीन होते हुए भी वह अज्ञान और अभिमान के कारण रोगी, वृद्ध और मृतक का उपहास करता है। अगर हम जान लें कि दुख क्या होता है तो हम सभी दुखियों के भाई बन जायें। गौतम बुद्ध के जीवन के दो पक्ष हैं: एक व्यक्तिगत और दूसरा सामाजिक।

हमारी परिचित बुद्ध प्रतिमा एक ध्यानस्थ योगी की प्रतिमा है जो समाधि के आन्तरिक आनन्द में मग्न है। यह थेराबाद-मत और अशोक के धर्म प्रचार से सम्बन्धित परम्परा है। इनकी दृष्टि में बुद्ध एक मनुष्य है, देवता नहीं। एक उपदेशक हैं, उदारकर्ता नहीं। बुद्ध के जीवन का एक दूसरा पक्ष तब प्रकट होता है जब वे मानवों के दुख से चिन्तित होते हैं, उनकी तकलीफों को दूर करते हैं और ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखायÓ का सन्देश फैलाते हैं। मानव जाति के लिए इस करुणा के आधार पर उत्तर भारत में कुषाणों (7०-48० ई.) और गुप्तों (32०-65० ई.) के काल में एक दूसरी परम्परा का परिपाक हुआ। इसके अन्तर्गत सर्वमुक्ति के आदर्श का, भक्ति मार्ग का और लोक सेवा की भावना का विकास हुआ। पहली परम्परा लंका, बर्मा और थाईलैंड में और दूसरी नेपाल, तिब्बत, कोरिया, चीन और जापान में फैली। इस मतभेद के बावजूद बौद्धों के सभी संप्रदाय इन बातों में एकमत हैं कि बुद्ध उनके धर्म-संस्थापक हैं। उनको बोधि-वृक्ष के नीचे तत्व का ज्ञान प्राप्त हुआ। उन्होंने इस दुखमय संसार से दूर जाने और अमृत का लाभ करने का मार्ग बताया।

बुद्ध का सन्देश है कि आदमी के अन्दर वह शक्ति और संकल्प है, जो उसे संसार से उठाकर सत्य पर प्रतिष्ठित करता है। यदि आदमी अपने अस्तित्व की सीमाओं को तोडऩे में असफल रहता है तो वह मृत्यु का ग्रास बनता है, विनाश को प्राप्त करता है। उसे पहले शून्य का अनुभव करना है, तभी वह उसके परे जा सकता है। इस वस्तुमय जगत से परे पहुंचने के लिए आदमी को विनाश की वेदना का अनुभव होना आवश्यक है। उसके अन्दर इस भावना का उदय होना आवश्यक है कि यह सारा दृश्य-जगत जो कि परिवर्तन और मृत्यु के नियम के अधीन है, नितांत शून्य है।

बुद्ध ने निर्वाण का और उसके लिए प्रयत्न करते रहने का उपदेश देकर एक दूसरी दुनिया के अस्तित्व में आस्था प्रकट की है। उन्होंने कहा है कि काल प्रवाह से ऊपर उठना और बुद्धत्व प्राप्त करना मनुष्य के लिए संभव है। विशुद्ध सत्ता काल-चक्र से ऊपर है। इसी पर संसार प्रतिष्ठित है। संसार निर्वाण में है। नित्यता काल में केंद्रित है। तत्वमसि।

हर एक के अन्दर एक ऐसी गुप्त शक्ति का निवास है, जो उसे कालप्रवाह से मुक्त कर सकती है, जो हमारी अन्तरात्मा को बाह्य वस्तुओं के बंधन से हटा सकती है, जिससे हम अपने अन्दर रहने वाले अमृत को खोज सकते हैं।

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