रोज कीमतों में बदलाव अव्यावहारिक

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अश्विनी महाजन
सरकार द्वारा एक मई, 2०17 से 5 शहरों में प्रयोग के तौर पर प्रतिदिन पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बदलाव के निर्णय से कीमतों में अस्थिरता की आशंका पैदा हो गई है। कुछ समय के अंतराल के बाद कीमतों में बदलाव की वर्तमान व्यवस्था में भी कोई खास कठिनाई नहीं आ रही, फिर अस्थिरता को बढ़ाने वाला यह निर्णय अनावश्यक प्रतीत होता है।

जून 2०1० से पहले पेट्रोल, डीजल, एलपीजी इत्यादि की कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित और निर्धारित होती थीं। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में रोज-रोज बदलती कच्चे तेल की कीमतें पेट्रोल, डीजल इत्यादि की कीमतों को प्रभावित नहीं करती थीं। गौरतलब है कि पेट्रोलियम पदार्थों का खनन, शोधन (रिफाइनिंग), वितरण आदि अधिकतर सरकारी क्षेत्र की कंपनियों के हाथ में ही होता था और अभी भी कुछ निजी क्षेत्र की कंपनियों (जैसे रिलायंस) को छोड़ अभी भी यह सरकारी क्षेत्र की कंपनियों जैसे ओएनजीसी, इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम इत्यादि के हाथ में ही है। पहले जब पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें सरकारी नियंत्रण में थीं, तब भी ये कंपनियां खासा लाभ कमाती थीं।

वर्ष 2००9-1० में भी सरकारी पेट्रोलियम कंपनियों ने केंद्रीय राजस्व में टैक्सों और लाभांशों के रूप में 1.84 लाख करोड़ रुपये दिये थे। अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों के बढऩे के कारण होने वाले नुकसानों की भरपाई ‘ऑयल बांड’ जारी करते हुए कर दी जाती थी और जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कीमतें कम होती थीं तो ‘ऑयल बांड’ वापिस खरीद लिये जाते थे। वर्ष 2०1०, जून माह में सरकार ने पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें बाजार पर छोडऩा तय कर दिया और शायद यह कदम निजी पेट्रोलियम कंपनियों के दबाव में लिया गया था। उसके बाद समय-समय पर पेट्रोल-डीजल इत्यादि की कीमतों में बदलाव आम बात हो गई है।

देखने वाली बात यह है कि इसके बाद भी पेट्रोलियम कंपनियों के लाभ बढ़ नहीं पाये हैं, लेकिन तेल की कीमतों में अस्थिरता जरूर बढ़ गई है। अब जब सरकार ने नयी व्यवस्था के नाते देश के पांच शहरों में तेल की कीमतों में हर रोज परिवर्तन करने को अपनी मंजूरी दी है, तेल की कीमतों में निर्धारण का मसला फिर से प्रकाश में आ गया है।

जब पेट्रोल, डीजल की कीमत सरकार द्वारा नियंत्रित और निर्धारित होती थी तो कीमतें साल में सामान्यत: दो बार ही बदलती थीं। उसके बावजूद भी पेट्रोलियम कंपनियां खूब लाभ कमाती थीं। इसलिए यह कहना कि नयी व्यवस्था कंपनियों को नुकसान से बचाने के लिए की गई थी, शायद सही नहीं होगा। गौरतलब है कि वर्ष 2००9-1० में जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी थीं तो भी सरकार ने मात्र 14954 करोड़ रुपए की पेट्रोलियम सब्सिडी दी थी। जून 2०1० में जब तेल की कीमतों पर नियंत्रण समाप्त किया गया तो मात्र एक ही महीने में पेट्रोल की कीमत 6 रुपए प्रति लीटर बढ़ गई थी।

यानी कहा जा सकता है कि नियंत्रण समाप्त होते ही पेट्रोलियम कंपनियों ने अधिकतम लाभ कमाने की दृष्टि से नई व्यवस्था का नाजायज लाभ उठाया। इसलिए जहां एकाधिकारिक प्रवृत्ति के चलते उपभोक्ताओं का शोषण संभावित हो, वहां-वहां सरकार को कीमतों पर अंकुश लगाने की व्यवस्था करनी चाहिए।

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