टीवी बहसों की संकीर्णता

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सुधीश पचौरी
अपने चैनल खबर कम देते हैं बहसें ज्यादा. बहसों को भी ‘शो’ की तरह दिया जाता है. ‘शो’ में अतिरिक्त प्रदर्शन का तत्व होता है, जिसे एंकर अतिरिक्त उत्तेजना पैदा करके बनाए रखता है.

‘शो’ में आकर खबर अचानक विचार, और विचार अचानक ‘शो’ बन जाते हैं. हम विचार नहीं ओपिनियन भी नहीं विचारों या ओपिनियनों के शो को चुनते हैं.
चूंकि एंकर इस तरह के शोज के संयोजक होते हैं, सवाल पूछने वाले होते हैं, नतीजे निकालने वाले और आखिरी फैसला देने वाले होते हैं, इसलिए दर्शक समझने लगते हैं कि असली ज्ञानी एंकर ही होते हैं, और कुछ एंकर भी ऐसा मान लेते हैं कि वे ही ज्ञानी हैं. कुछ एंकर तो ऐसे भी हो गए हैं, जो मानते रहे हैं कि वे अपने शो से देश का एजेंडा तय करते हैं, उसे हांकते हैं, उसे दिशा देते हैं. लेकिन जब उनके चैनलों के मालिकों ने किसी कारण से उनको काम से हटा दिया तो मालूम हुआ कि वे न देश चला रहे थे, न समाज को चला रहे थे और कि चैनल ही उनको चला रहा था. हमारा टीवी इसी शोबाजी की प्रक्रिया में खबर का माध्यम न रह कर शो बिज का माध्यम बन गया है.

चैनलों के सबसे अच्छे दिन शनिवार और रविवार होते हैं, जब उनको अपने स्टूडियो को फिल्मी दुनिया के हवाले कर देना होता है, या इंपेक्ट फीचर्स यानी किराए के शो के हवाले कर देना पड़ता है. इन दिनों कॉनक्लेव, एन्कलेव, समिट आदि कराना भी विचारों के नए लाइव शोज की तरह आने लगा है, जिनमें खबरें ब्रेक की जाती हैं, ताली मिलती हैं, सलेक्टेड जनता सवाल करती है, और जवाब दिए जाते हैं. यह भी राजनीति के परफारमेंस में बदल जाने का परिणाम है कि खबर के स्रोत अब पांच सितारा होटल बनने लगे हैं.

यह खबर की ऐलीट (श्रेष्ठि वर्ग) से ऐलीट तक की एक जैसी यात्रा है. ऐलीट ही खबर बना रहा है. इधर विचार चल रहा है, सवाल पूछे जा रहे हैं, जवाब दिए जा रहे हैं. उधर सामने बैठा उच्चवर्गीय ऐलीट विचारों के साथ अपने सामने रखी मेज पर रखी प्लेट से मेवे कुटक रहा है, भोजन कर रहा है, और पी-पिला रहा है, और ताली बजा रहा है, हंस रहा है. यह है ‘ओपिनियन का उपभोग’! ओपिनियन आई, हमने खाने के संग खाई और हजम. हम ओपिनियनों को हजम करते रहते हैं. वे हमें न सताती हैं, न परेशान करती हैं. वे हमें सिर्फ ‘आनंद’ देती हैं.

ऐसा नहीं है कि टीवी में खबरें नहीं हैं. वे हैं लेकिन खंडित और टूटी हुई दो-चार खबरों की तरह होती हैं. एक खबर को तोड़कर उसकी दस टुकड़ा खबर बनाई जाती हैं, और बीच-बीच में तीखा म्यूजिक डाल कर सनसनी के अंदाज में दिखाई जाती हैं. इस तरह से हम खबर नहीं खबरों की चिंदियां देखते सुनते हैं. बाकी समय हम फीचर या ओपिनियनों के शो देखते हैं. ऐसे शोज में आप किसी के विचार की गुणवत्ता पर नहीं जाते. आप विचार को बोलने वाले की अदा, उसके शोर-शराबे, उसकी धमकी, उसकी ताल ठोकू मुद्रा के कायल होते हैं. आप विचार नहीं, विचारों का दंगल देखा करते हैं, जहां जो कुश्ती मार ले, वही सही माना जाता है. यानी विचार की सही-गलत होना उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जितना कि कुश्ती मारने वाले की जीत की मुद्रा.

इसलिए हम तर्क, तथ्य, प्रति-तर्क या प्रति-तथ्य की चिंता न करके शोर-शराबे और हल्ले को सत्य समझने लगते हैं.

हम खबर की जगह हल्ले को देखते-सुनते हैं. अगर हमारे समाज में विचार-वितर्क की आदत कम हो रही है, एक दूसरे के विचार को सहने की आदत कम हुई जा रही है, तो उसका एक बड़ा कारण बहसों का शो में बदलना भी है, जिनकी नकल करके हम विचार की जगह हल्ले को सही समझते हैं. हम भी उसकी नकल पर हल्ले का शो ही करते हैं. इस खेल को बनाए रखने का कारण यह भी है कि खबर जुटाना महंगा पड़ता है. ओपिनियन जुटाना सस्ता पड़ता है. ओपिनियन जुटाने से एंकर का जनसंपर्क बढ़ता है. बुद्धिजीवी हलकों में गुडविल बनती है. अब हम जरा ‘डिबेट शोज’ की बात करें. डिबेट शो अपने आप में वैचारिक कट्टरता के हामी बन चले हैं.

इन दिनों इन शोज से ‘वैचारिक विविधता’ का अवसान हो गया है. कई एंकर तो स्वयं कट्टर वैचारिकता के प्रवक्ता बन जाते हैं. यह हमारी वैचारिकता का संकट है. सवा सौ करोड़ की जनता में सत्तर से अस्सी करोड़ तक टीवी की पहुंच कही जाती है, यानी अस्सी करोड़ जनता तो दर्शक है ही लेकिन उसे समझाने वाले, नसीहत देने वालों की संख्या है कुल सौ से डेढ़ सौ. टीवी हमें इसी तरह विचार-विपन्न और विचार-संकीर्ण बना रहा है.

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