टलेगा कोरिया का खतरा?

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करप्शन के गंभीर आरोपों में पद से हटाई जा चुकी पार्क ग्युन-हे की जगह वामपंथी रुझान वाले नेता मून जे-इन साउथ कोरिया के नए राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं। इन चुनावों में भ्रष्टाचार के आरोपों से उपजी लोगों की निराशा तो झलकी ही, अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर खड़ी चुनौतियों ने भी खासा योगदान दिया। मून जे-इन ने लोगों में न केवल देश के अंदर सुधार का भरोसा जगाया, बल्कि न्यायपूर्ण समाज की स्थापना का वादा भी किया। हालांकि उनके चुनाव जीतने और राष्ट्रपति पद पर आसीन होने के बाद जिस बात को सबसे ज्यादा रेखांकित किया जा रहा है, वह है नॉर्थ कोरिया को लेकर उनका नजरिया।

चुनाव के दौरान भी मून ने यह बात खुलकर कही कि वह नॉर्थ कोरिया के साथ बातचीत के पक्षधर हैं। इसी वजह से विरोधी पक्ष ने उन्हें प्योंगयांग समर्थक वामपंथी कहना शुरू कर दिया था। लेकिन इस प्रचार या दुष्प्रचार के बावजूद उन्हें 41.1 फीसदी वोट मिले, जबकि दूसरे नंबर पर रहे कंजर्वेटिव उम्मीदवार होंग जुन-प्यो को महज 24.०3 फीसदी। शपथ लेने के बाद मीडियाकर्मियों से पहली बातचीत में ही मून ने प्योंगयांग जाने की इच्छा जता दी है, जो उनकी सरकार की नीतियों की दिशा का स्पष्ट संकेत है। गौरतलब है कि नॉर्थ कोरिया पिछले एक साल से जिस बदहवासी में मिसाइल टेस्ट और न्यूक्लियर टेस्ट करता रहा है, उससे इस पूरे इलाके में तनाव बना हुआ है। ऐसे में साउथ कोरिया का नेतृत्व अगर उसे बातचीत की प्रक्रिया में शामिल कर पाता है तो यह न केवल उत्तरी चीन सागर के लिए बल्कि पूरी दुनिया के लिए राहत की बात हो सकती है।

अमेरिका से दक्षिण कोरिया का पुराना जुड़ाव है और इस देश में अमेरिकी फौज की प्रत्यक्ष उपस्थिति नए राष्ट्रपति की पहलकदमी को एक सीमा से आगे शायद ही बढऩे दे, लेकिन मून ने सारी बातें अमेरिका से अपने रिश्तों की अहमियत को रेखांकित करते हुए ही की हैं। इससे लगता है कि वे अमेरिका को साथ लेते हुए नॉर्थ कोरिया को मैत्री और सहयोग के धागे में बांधने की राह पर आगे बढ़ेंगे। मौजूदा हालात में ज्यादा उम्मीदें पालना व्यावहारिक नहीं है, फिर भी मून के संकल्प ने बारूद के ढेर पर बैठे इस इलाके में कुछ संभावनाएं तो जगा ही दी हैं।(आरएनएस)

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