कश्मीर के रिसते जख्म

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एक उदीयमान सैन्य अधिकारी फैयाज अहमद की कश्मीर के शोपियां में हुई निर्मम हत्या कश्मीरियों और पूरे देश के लिये आंखें खोलने वाली है। कश्मीरियों के लिए इस मायने में कि जिस आभासी आजादी के नारों के साथ वे सड़कों पर उतर रहे हैं, सुरक्षा बलों पर निशाना साध रहे हैं, लोकतंत्र का उपहास कर रहे हैं, उसका सच भयावह है। वो आतंक का दानव उनके प्रतिभावान बच्चों को निगलने को भी तैयार बैठा है। उसका मकसद सिर्फ खूनखराबे से पाकिस्तान के मंसूबों को पूरा करना है। आखिर क्या कसूर था फैयाज का? वह देशभक्त था और देश की रक्षा की खातिर फौज में भर्ती हुआ था। उसकी जिद तो यही थी कि वह आतंकवादियों की धमकी के बावजूद फौज में भर्ती हुआ। यह खतरनाक संकेत है।

आने वाले दिनों में सेना व सुरक्षा बलों में शामिल होने का सपना देख रहे युवाओं को हतोत्साहित होना पड़ेगा। यह देश के लिए भी गंभीर चुनौती है, जो गंभीर समाधान मांगती है। दिन-प्रतिदिन विकट होती कश्मीर समस्या देश के हुक्मरानों की चिंता का विषय होनी चाहिए। पिछले दिनों हुए उपचुनावों में वोटों का प्रतिशत जिस तरह लुढ़का है, वह बताता है कि कश्मीर का जनमानस आतंकवादियों के गहरे दबाव में है। लोग अपनी जान की खातिर राय देने से कतराने लगे हैं। दूसरे मायने में निहत्थे फैयाज की निर्मम हत्या आतंकवादियों की बौखलाहट को भी दर्शाती है।

ये कायराना हरकत बताती है कि आतंकवादी सेना-सुरक्षा बलों का मुकाबला करने के बजाय साफ्ट टारगेट के जरिये कश्मीरी युवाओं को भयभीत करना चाहते हैं ताकि वे सेना व सुरक्षा बलों में शामिल न हों। पाकिस्तानपरस्त जेहादी ताकतों को अलग-थलग करने का अब वक्त आ गया है। केंद्र व राज्य की सत्ता में शामिल भाजपा को अब सोचना चाहिए कि कश्मीर के हालात दिन-प्रतिदिन खराब हो रहे हैं।

जब तक दोनों सरकारें जनता में आतंकवादियों के खिलाफ खड़े होने वाली सोच पैदा नहीं करेंगी, तब तक आतंकवादी अपने मंसूबों को यूं ही पूरा करते रहेंगे। सरकारों को आतंकवादियों के हाथों कठपुतली बनी अलगाववादी राजनीति को भी बेनकाब करना चाहिए।

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