उदारवाद की जीत

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फ्रांस में इमैन्युअल मैक्रों के रूप में अंतत: उदारवाद की जीत हुई। यह इसलिए संभव हो पाया, क्योंकि धुर दक्षिणपंथ के खिलाफ देश के बाकी सारे राजनीतिक धड़े अपने मतभेदों को भुलाकर एक हुए। उन्होंने एक-दूसरे के प्रति बदले की भावना से काम न करके फ्रांस की समावेशी संस्कृति और सबको साथ लेकर चलने वाली सियासत का ही दामन थामा। दरअसल चुनाव के पहले चरण में मैरीन ल पेन की जीत से वहां कट्टरपंथी शासन का खतरा मंडराने लगा था, जिससे दुनिया भर का प्रबुद्ध तबका चिंतित हो गया था।

बहरहाल, अंतिम दौर में मैक्रों ने दो तिहाई बहुमत के साथ जबर्दस्त जीत हासिल की। उन्हें कुल 66.०6 फीसदी वोट मिले जबकि मैरीन ल पेन को 33.94 फीसदी से ही संतोष करना पड़ा। मैक्रों की जीत से सबसे बड़ी राहत फ्रांस के मुसलमानों को मिली है क्योंकि मैरीन ने चुनाव जीतने पर फ्रांस की सभी मस्जिदों पर ताला लगवाने की बात कही थी। उनका स्वर अंध राष्ट्रवाद का रहा है, जबकि मैक्रों ग्लोबलाइजेशन के पक्षधर हैं और सबको साथ लेकर चलने की बात करते हैं। मैक्रों फ्रांस को और सक्रियता के साथ यूरोपीय संघ में बनाए रखने की बात करते रहे हैं, जबकि मैरीन इससे अलग होकर फ्रांस का पुराना गौरव वापस लाने का नारा बुलंद करती रही हैं।

मैक्रों की सफलता वाकई अद्भुत है। आज से तीन साल पहले फ्रांस की राजनीति में उनकी कोई पहचान नहीं थी। लेकिन आत्मविश्वास, ऊर्जा और आम लोगों से जुड़ाव के बूते मैक्रों ने एक ऐसा राजनीतिक आंदोलन खड़ा किया, जिसके आग फ्रांस के सभी स्थापित राजनीतिक दल फीके पड़ गए। फ्रांसीसी गणतंत्र में 1958 के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि चुना गया राष्ट्रपति वहां के दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों, सोशलिस्ट और रिपब्लिकन पार्टी से नहीं है। मैक्रो चाहते तो सोशलिस्ट पार्टी की उम्मीदवारी के लिए भी लड़ सकते थे, लेकिन उन्होंने समझ लिया था कि इस पार्टी से जनता का मोहभंग हो चुका है। इसलिए अप्रैल 2०16 में उन्होंने एन मार्शे आंदोलन की स्थापना की और चार महीने बाद फ्रांस्वा ओलांद की सरकार से इस्तीफा दे दिया।

बहरहाल, मैक्रों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे बारूद के ढेर पर बैठे हैं। देश के एक तिहाई लोग आज खुलकर धुर-दक्षिणपंथ के साथ हैं। वहां एक भी आतंकी घटना राजनीतिक संतुलन को दूसरी तरफ झुका सकती है। अगले महीने संसदीय चुनाव होने हैं।

मैक्रों की पार्टी के पास संसद में एक भी सीट नहीं है। अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए मैक्रों को गठबंधन करना पड़ सकता है। फिर भी नतीजे अनुकूल नहीं आए तो उनके लिए आगे का सफर मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने जो वादे किए हैं उन पर अमल करके दिखाना होगा। फ्रांस में 25 साल से कम उम्र का हर चौथा शख्स बेरोजगार है। भारत को लेकर मैक्रों का नजरिया सकारात्मक है। उम्मीद करें कि भारत-फ्रांस संबंध उनके नेतृत्व में और अच्छे होंगे।(आरएनएस)

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