राजनीतिक दलों के बुरे दिन

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2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अच्छे दिन आने वाले है के नारे पर बम्पर जीत हासिल की थी। आम आदमी और देश के कितने अच्छे दिन आये अभी इस बारे में पूरी ईमानदारी से कुछ नहीं कहा जा सकता। लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद देश के तमाम राजनीतिक दलों के बुरे दिन जरूर आ गये है। जो राजनीतिक दल अपने मुठ्ठी भर विधायक व सांसदों के दम पर सत्ता में बड़े से बड़ा रूतबा हासिल कर लेते थे अब उनकी उल्टी गिनती शुरू हो गयी है।

कांग्रेस से लेकर सपा-बसपा-रालोद व आम आदमी पार्टी तक जिसने बड़ी धमाकेदार जीत के साथ अपनी राजनीतिक पारी शुरू की थी सब के सब चारों खाने चित्त दिखाई दे रहे है। खास बात यह है कि अब इन दलों के नेताओं में एक ऐसा अंतहीन संघर्ष शुरू हो गया है कि वह खुद ही एक दूसरे को नंगा करने में जुटे हुए है। नसीमुद्दीन सिद्दकी को बसपा द्वारा बाहर का रास्ता दिखाया जाना इसका ताजा उदाहरण है।

सिद्दकी बसपा और मायावती की राजनीतिक बखिया उधेड़ रहे है। उत्तर प्रदेश राज्य में लम्बे समय तक सत्ता पर काबिज रहने वाली बसपा और मायावती का जो चित्र व राजनीतिक चरित्र अब लोगों के सामने आया है वह बसपा के समर्थकों को शर्मशार कर रहा है। यही नहीं सपा के कुनबे में मचा महाभारत उसे अर्श से फर्श पर ला चुका है। मुलायम सिंह अब पानी पी-पी कर अखिलेश को कोस रहे है। उन्हे अब यह साफ हो गया है कि सपा के पुराने दिन सहज लौट कर आने वाले नहीं है। बिहार में नितिश कुमार व लालू यादव का मोर्चा विघटन के कगार पर है प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममता अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है वहीं तमिलनाडू में जयललिता की पार्टी में भी घमासान जारी है।

दरअसल इन तमाम राजनीतिक दलों के इन बुरे दिनों के पीछे इन पार्टियों के नेताओं की करनी ही सबसे बड़ा कारण है। इन नेताओं व राजनीतिक दलों ने जनता को लूटा है और उसकी सेवा के नाम पर शोहरत और ऐश की है जिनकी कलई अब खुल चुकी है। यह तमाम दल लामबंद होकर भाजपा को रोकना चाहते है लेकिन यह तभी संभव है जब वह ईमानदारी की राजनीति करें।

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