प्रीतम की अग्नि परीक्षा

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उत्तराखण्ड प्रदेश कांग्रेस की कमान अब प्रीतम सिंह ने संभाल ली है। कांग्रेस हाईकमान ने उन्हे यह जिम्मेवारी ऐसे वक्त सौंपी है जब कांग्रेस अब तक के सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। कल प्रीतम सिंह की ताजपोशी में कांग्रेसियों ने जिस तरह का दमखम दिखाया अगर उतना दम विधानसभा चुनाव में दिखाया होता तो संभव है कि कांग्रेस को इतनी बुरी हार से दो चार नहीं होना पड़ता।

दरअसल कांग्रेस की परम्पराएं कुछ ऐसी ही है जिसके पास भी महत्वपूर्ण ओहदा आता है कांग्रेसी उसी की जय जयकार में जुट जाते है और जैसे ही कुर्सी खिसकती है सब मुंह मोड़ लेते है। यही नहीं कांग्रेस में चाटूकारों की एक ऐसी फौज है जो न तो किसी को काम करने देती है और वह किसी को भी उलझाये रखने में माहिर है।

कल निवर्तमान प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय ने भले ही अपने नये अध्यक्ष प्रीतम सिंह से चुटकी ही ली कि वह कान खजूरों से होशियार रहे लेकिन उनकी यह चुटकी उसी सच की ओर इशारा करती है जिसकी बात हम कर रहे है। उत्तराखण्ड गठन के बाद सूबे की पहली निर्वाचित सरकार बनाने वाली कांग्रेस की स्थिति आज इतनी दयनीय हो गयी है कि वह 70 में से सिपर्फ 11 सीटों तक सीमित होकर रह गयी है तो इसके पीछे कांग्रेस की वह अंदरूनी राजनीति ही सबसे अहम कारण है जिसमें यह कांग्रेस के नेता सिर्फ अपने ही बारे में सोचते है।

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत जो पहले प्रदेश अध्यक्ष थे सिर्फ और सिर्फ मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए ही लड़ते रहे। मुख्यमंत्री बनकर उन्हे व कांग्रेस को क्या हासिल हुआ इस पर अब उन्हे चिंतन मथंन करना चाहिए। प्रीतम सिंह प्रदेश अध्यक्ष बन जरूर गये है लेकिन अगर उन्होने भी पार्टी के बजाय अपने लिये ही काम किया तो उनको इसका कोई फायदा होने वाला नहीं है पार्टी का जो होगा सो होगा ही।

आज कांग्रेस जिस स्थिति में है वहां से उसे पुनः सत्ता की कुर्सी तक पहुंचा पाना असंभव न सही लेकिन मुश्किल व चुनौती पूर्ण जरूरी है। वास्तव में यह पद प्रीतम सिंह की कड़ी अग्नि परीक्षा लेगा। वह कितने सफल होते है यह समय ही बतायेगा।

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