आसमानी गिफ्ट

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इसरो द्वारा पिछले दिनों लॉन्च किया गया कम्यूनिकेशन सैटलाइट (जी सैट 9) स्पेस टेक्नॉलजी में भारत की बढ़त से ज्यादा अपनी उपलब्धियों को पड़ोसी देशों के साथ साझा करने की इच्छा को रेखांकित करता है। 2०14 में सार्क के काठमांडू शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्क सैटलाइट का प्रस्ताव रखा था। शुरू में इस योजना में सार्क के सभी देशों को शामिल किया गया था, लेकिन पाकिस्तान कुछ ही समय बाद इससे अलग हो गया। वह इस सैटलाइट को विकसित करने की प्रक्रिया में शामिल होना चाहता था, लेकिन भारत की पेशकश इसे गिफ्ट करने की थी। उसका पाकिस्तान को बात नहीं जमी तो वह इस अनुरोध के साथ प्रॉजेक्ट से अलग हो गया कि इसे सार्क सैटलाइट न कहा जाए। बहरहाल, इसे सार्क सैटलाइट भले न कहा जा रहा हो, पर इसकी लॉन्चिंग के मौके पर माहौल सार्क सम्मेलन जैसा ही हो गया था। भारत सहित दक्षिण एशिया के सात देशों- अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, श्रीलंका और मालदीव के राष्ट्र प्रमुखों ने विडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक में शिरकत की और इसे संबोधित भी किया। यह दक्षिण एशियाई देशों के बीच अंतरिक्ष सहयोग की अनूठी और नई पहल है। साढ़े चार सौ करोड़ रुपये की लागत से बना 12 साल की मिशन लाइफ वाला यह सैटलाइट इन सभी देशों के लिए न सिर्फ कम्यूनिकेशन में, बल्कि आपदा प्रबंधन के काम में भी खासा उपयोगी साबित होगा। इसके ट्रांसपॉन्डर्स का उपयोग सभी पड़ोसी देश मुफ्त में कर पाएंगे। जल्दी ही इसका फायदा हमें इन देशों में प्रसारण सेवाओं, शिक्षा व चिकित्सा सेवाओं और बैंकिंग नेटवर्क आदि के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव के रूप में दिख सकता है। ये बदलाव सरकारों को ही नहीं, इस पूरे क्षेत्र के लोगों को भी एक-दूसरे से जोड़ेंगे। सहयोग का सीधा फायदा इन देशों के आम लोगों तक पहुंचेगा। इस पहल की एक खास बात इसकी टाइमिंग भी है। मोदी सरकार ने दक्षिण एशिया के तमाम देशों के जन-जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की यह पहल ऐसे समय में की है, जब चीन इस इलाके में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्शाने के लिए किसी बी हद तक जाने को तैयार है। दक्षिणी और पूर्वी चीन सागर में बढ़ते तनाव के बीच भारत की यह पहल विश्व शांति और सहयोग का एक संदेश देती है। मोदी सरकार ने इस पहल के जरिए कूटनीतिक सहयोग की संभावनाओं का एक नया द्वार खोला है। जिन तनावों और आशंकाओं के दौर से दुनिया इस वक्त गुजर रही है, उनके बीच भारत ने ताकतवर देशों को यह संदेश देने की कोशिश की है कि अपनी जानकारी, हुनर और ऊर्जा का उपयोग आसपास के देशों का जीवन स्तर ऊपर उठाने में किया जा सकता है। देखें, अन्य देशों के नेता इस संदेश को किस रूप में ग्रहण करते हैं।(आरएनएस)

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