अखिलेश बनाम शिवपाल

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समाजवादी पार्टी टूटेगी, या शिवपाल सिंह यादव जो नया सेक्युलर मोर्चा बनाने जा रहे हैं, उसका स्वरूप क्या होगा, इस बारे में मुलायम सिंह यादव का कहना है कि परिवार या पार्टी में अलगाव नहीं होगा। हालांकि शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच जुबानी जंग पूरी बेफिक्री से जारी है और रविवार को मुलायम सिंह भी इस जंग में शिवपाल के साथ खड़े दिखे। यूपी विधानसभा चुनाव से पहले जब बेटे और भाई में टिकट बंटवारे और पार्टी पर कब्जे को लेकर विवाद हो रहा था, तब मुलायम सिंह यादव ने चुनाव आयोग के कड़े रुख को देखते हुए अपने कदम पीछे खींच लिए थे कि कहीं चुनाव चिह्न ही न फ्रीज हो जाए। अखिलेश ने भी समझौते के मूड में आते हुए चुनाव के तीन महीने बाद पार्टी अध्यक्ष का पद नेताजी को लौटा देने की बात कही थी।

अब, जब चुनाव संपन्न हुए दो महीने बीतने जा रहे हैं, तब शिवपाल यादव बात को नए सिरे से उभारने के लिए बेचैन दिख रहे हैं। नई पार्टी या मोर्चा बनाने की उनकी घोषणा इसी बेचैनी का परिचायक है। वैसे उनकी बेचैनी देखते हुए मुलायम सिंह ने कहा है कि वह उन्हें मनाएंगे तो इसलिए क्योंकि हाथ में अपनी पार्टी ही नहीं होगी तो वे भला किस सेक्युलर मोर्चे का नेतृत्व कर पाएंगे? वहीं ऐसे सवालों को लेकर शिवपाल बिल्कुल चिंतित नहीं हैं। अभी भी उनकी कोशिश समाजवादी पार्टी के ढांचे और जनाधार के बीच अखिलेश यादव को अलग-थलग करने की है, और उन्हें उम्मीद है कि इस तरह के बयानों से उनका यह मकसद अच्छी तरह सध रहा है। रही सही कसर मुलायम सिंह ने रविवार को हार का ठीकरा अखिलेश और कांग्रेस गठबंधन पर फोड़कर पूरी कर दी है। चुनाव में मिली हार के बाद माना जा रहा था कि एक अर्से से यूपी की

राजनीतिक धुरी बने इस यादव परिवार का झगड़ा अपने आप खत्म हो जाएगा। लेकिन शिवपाल सिंह और कहीं न कहीं उन्हें शह देते मुलायम सिंह का रवैया देखकर लगता है कि परिवार के पुनर्मिलन की संभावना बहुत कम है। बाप-बेटे का अलगाव भला कौन चाहता है, लेकिन लग यही रहा है कि 2०22 में यूपी का अगला विधानसभा चुनाव आते-आते सैफई मार्का समाजवाद के दो संस्करण मतदाताओं के सामने उपलब्ध होंगे।(आरएनएस)

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