शराब पर संग्राम

0
75

सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईवे से शराब के ठेकों को हटाने के निर्देश उत्तराखण्ड के शासन-प्रशासन के लिए गले की हड्डी बन गये है। सूबे की जिन चार सौ से अधिक शराब की दुकानों को हटाया जाना था वह डेढ़ माह बाद भी नहीं खुल सकी है। राष्ट्रीय राजमार्गो से स्थानान्तरित करने के लिए समुचित स्थान की तलाश आबकारी विभाग के लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है। इन शराब की दुकानों को मुख्यमार्गो से हटाकर आबादी क्षेत्रों में खोले जाने का जिस तरह से विरोध् हो रहा है उसमें सूबे की मातृशक्ति की सबसे अग्रणी भूमिका है।

शराब बंदी की मांग कर रही महिलाओं ने यह साफ कर दिया है कि वह अपने घर गली व मौहल्ले में शराब के ठेकों को नहीं खुलने देगी चाहे उन्हे अपनी जान देनी पड़े। उनका आरोप है कि वह अपने घर परिवार को नहीं उजड़ने देगी। खास बात यह है कि आबकारी विभाग और पुलिस प्रशासन से आये दिन इन महिलाओं का टकराव हो रहा है तोड़ फोड़ और लाठी डंडे चल रहे है। महिलाओं के खिलाफ मुकदमें लिखे जा रहे है। लेकिन सत्ता पक्ष के नेताओं द्वारा इस मुद्दे पर चुप्पी साध् ली गयी है। जिसे लेकर इन महिलाओं में सरकार और भाजपा के खिलाफ जनाक्रोश को साफ देखा जा सकता है।

महिलाओं का यह आन्दोलन धीरे-धीरे और अधिक उग्र होता जा रहा है। दरअसल सरकार अपना रूख स्पष्ठ नहीं कर पा रही है। प्रारम्भिक दौर में मुख्यमंत्री द्वारा सूबे में शराब बंदी की बात कह तो दी गयी लेकिन अब सरकार शराब से हर साल होने वाली 18-20 हजार करोड़ की आय का लालच नहीं छोड़ पा रही है।

सवाल यह है कि आखिर यह संग्राम कब तक चलता रहेगा। विपक्षी दल कांग्रेस ने भी अब इस मुद्दे पर राजनीति शुरू कर दी है वह विरोध् प्रदर्शन कर रही महिलाओं के समर्थन में खड़ी है व पुलिस कार्यवाही का विरोध् कर रही है लेकिन जरूरत इस मुद्दे के समाधान की है इस पर राजनीति की नहीं। सरकार को यह ठेके आवासीय क्षेत्रों में तो कतई नहीं खोलने चाहिए उसे महिलाओं की समस्याओं पर गौर करने की जरूरत है।

LEAVE A REPLY