पाक को सख्त सबक समय का समय

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पंकज चतुर्वेदी
पिछले दिनों पाकिस्तानी सेना ने हमारी सीमा में ढाई सौ मीटर भीतर घुसकर 22वीं सिख रेजीमेंट के नायब सूबेदार परमजीत सिंह और सीमा सुरक्षा बल की 2००वीं बटालियन के प्रधान आरक्षक पर छुप कर हमला किया और उनका सिर काट कर अपने साथ ले गए। पिछले तीन साल में ऐसी बर्बर तीसरी घटना से जनमानस हिल गया है। जैसा कि स्वाभाविक प्रतिक्रिया होनी थी, जनमानस पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने, बदला लेने, ईंट से ईंट बजा देने की मांग कर सड़कों पर है। शहीदों के परिवार भी गुस्से में हैं। जनता तत्काल परिणाम चाहती है।

लेकिन सरकार में बैठे लोग दूरगामी नजरिये से जवाब देना चाहते हैं। असल में सीमा पर जो हुआ, उसे केवल उस घटना के परिप्रेक्ष्य से आगे बढ़कर देखना होगा। पाकिस्तान में पनामा लीक मामले में नवाज शरीफ फंस गए हैं। पाक सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ ज्वाइंट इन्वेस्टीगेशन टीम (जेआईटी) के गठन का आदेश दिया है। जेआईटी हर 15 दिन में कोर्ट में रिपोर्ट पेश करेगी। ऐसी भी चर्चा है कि इस फैसले से शरीफ को पद भी छोडऩा पड़ सकता है।

पाकिस्तानी वेबसाइट डॉन के मुताबिक यह स्पेशल बेंच धारा 184/3 के तहत मामले की जांच करेगी। जांच में ये पता लगाया जाएगा कि आखिर पैसा कैसे कतर पहुंचा। अगले साल होने वाले चुनावों को लेकर नवाज के परिजन कथित तौर पर इसे एक राजनीतिक मोड़ दे रहे हैं। नवाज शरीफ द्वारा अपने विश्वस्त सहायक की बर्खास्तगी को सेना ने नकार दिया है। पनामा पेपर लीक मामले में सुप्रीम कोर्ट की जांच के आदेश से शरीफ पहले से ही दबाव महसूस कर रहे हैं। अब सेना के रुख से उनकी मुश्किलें और बढ़ गई हैं।

भारत से छद्म युद्ध को लेकर सेना और सरकार के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक की सूचना नवाज के विश्वसनीय सहायक सैयद तारिक फातमी ने लीक कर दी थी। इस वजह से शरीफ ने फातमी को बर्खास्त कर दिया था। लेकिन सेना ने सरकार के फैसले को खारिज कर दिया। सेना की ओर से इस आशय की प्रतिक्रिया आते ही नवाज सरकार ‘डैमेज कंट्रोल’ में जुट गई है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान में असल सरकार सेना और आईएसआई चलाती है।

ठीक इसी समय भारत के बड़े उद्योगपति सज्जन जिंदल नवाज शरीफ से मिलने गए। सनद रहे ये वही जिंदल हैं, जिन्होंने पूर्व में भी नवाज शरीफ व नरेन्द्र मोदी के बीच निजी मुलाकात का खाका खींचा था। पाकिस्तान के अखबार ‘डान’ के संपादकीय पेज पर बड़ा -सा लेख छपा, जिसमें भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता फिर शुरू होने की सुगबुगाहट इस मुलाकात का असली मकसद बताया गया। ठीक उसके बाद कश्मीर में ताबड़तोड़ घटनाएं हुईं। तीन दिन में 1० से ज्यादा पुलिस वालों को मार कर हथियार लूटे गए। सेना के कैंप पर हमला हुआ और दो जवानों के शवों के साथ पाशविक व्यवहार किया गया।
जाहिर है कि ऐसा सब कुछ कर लिया गया, जिससे भारत कड़ी सैन्य कार्रवाई करे और कहीं पिघलती बर्फ फिर कड़ी हो जाए। सवाल फिर भी खड़ा होता है कि क्या पाकिस्तान की इस अंदरूनी राजनीति की मजबूरी समझते हुए हम अपने देश में आतंकियों, पाकिस्तानी सेना को ऐसी नृशंस हरकतें करने दें? एक सशक्त राष्ट्र तो कभी भी ऐसा नहीं चाहेगा।

चुप बैठना अब ठीक नहीं है। मगर पाकिस्तान की कुछ ताकतें युद्ध ही चाहती हैं। हम यदि पाकिस्तान पर हमला करते हैं तो उनके उद्देश्य की पूर्ति होगी। इसे बहाना ही कहा जाएगा कि नवाज शरीफ अपनी कुर्सी बचाने के लिए यह तनाव उपजा रहे हैं। आखिर हम उनकी अंदरूनी राजनीति की कीमत क्यों चुकाएं? पाकिस्तान को ठीक करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाकर उसका ‘मोस्ट फेवरेट नेशन’ का दर्जा समाप्त हो। संसद एकमत होकर पाकिस्तान को आतंकी राष्ट्र घोषित कर सभी मित्र देशों के पास सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेज कर इसका दबाव बनाया जाए।

हम अभी भी अमेरिका से उम्मीद करते हैं कि वह पाकिस्तान को आतंकी देश घोषित करे। आखिर इसकी पहल हम ही क्यों ना करें। पाकिस्तान को हर दिन आ-जा रहे 3०० ट्रकों की तिजारत बंद हो। हमारे कई उद्योगपतियों के कारखाने, निर्माण प्रोजेक्ट वहां चल रहे हैं। ये सभी प्रोजेक्ट बन्द हों। इसके साथ ही सैन्य कार्रवाई छोटे-छोटे अंतराल में होती रहनी चाहिए।

यदि हमारा खुफिया तंत्र मजबूत हो और हमारे पास सीमा पार के आतंकी कैंपों की पुख्ता जानकारी हो तो घुस कर उन्हें तबाह करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए। दुनिया उसे ही सलाम करती है जो विनय के साथ उपद्रवियों को माकूल जवाब दे।

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