चिंताएं विकासशील देशों की

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जयंतीलाल भंडारी
इस समय दुनिया के विकसित देशों में घरेलू स्तर पर नौकरियों को बढ़ावा देने की अंतर्मुखी नीति के नारे के साथ तेजी से बढ़ रहा परिदृश्य भारत सहित विकासशील देशों के लिए एक बड़ी आर्थिक चुनौती बन गया है.

वस्तुत: विकसित देशों के वीजा रोक और कई वस्तुओं के आयात नियंत्रण संबंधी प्रतिबंध विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के उद्देश्य के प्रतिकूल हैं. यही कारण है कि विकासशील देशों के करोड़ों लोग जोर-शोर से यह कह रहे हैं कि जब डब्ल्यूटीओ के तहत पूंजी का प्रवाह पूरी दुनिया में खुला हो गया है, तो श्रम के मुक्त प्रवाह पर विकसित देशों द्वारा तरह-तरह के प्रतिबंध अनुचित और अन्यायपूर्ण हैं.

निसंदेह विकसित देशों की संरक्षणवादी नीति ने भारत के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. गौरतलब है कि पिछले दिनों 19 अप्रैल को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ‘बाय अमेरिकन हायर अमेरिकन’ नीति को बढ़ावा देते हुए उस सरकारी आदेश पर दस्तखत कर दिए जो एच1बी वीजा जारी करने की प्रक्रिया को कड़ा करेगा. भारतीय आईटी कंपनियां वर्ष 2०17 में एच-1बी वीजा पर करीब 2० हजार इंजीनियरों को ही अमेरिका भेज पाएगी, जबकि पिछले साल यह संख्या 4० हजार थी. एच-1बी वीजाधारकों के जीवनसाथी को वर्क परमिट दिए जाने का नियम भी अमेरिकी सरकार बदलने जा रही है.

इसी तरह 18 अप्रैल को ऑस्ट्रेलिया ने बढ़ती बेरोजगारी से निपटने के लिए 95,००० से अधिक अस्थायी विदेी कर्मचारियों द्वारा उपयोग किए जा रहे वीजा कार्यक्रम को समाप्त कर दिया. इन कर्मचारियों में ज्यादातर भारतीय हैं. इस कार्यक्रम को 457 वीजा के नाम से जाना जाता है. इस नये नियम का सबसे ज्यादा असर भारत पर होगा.

न केवल अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया वरन सिंगापुर, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड सहित दुनिया के कई देशों में संरक्षणवादी कदमों के तहत वीजा पर सख्ती के परिदृश्य से जहां एक ओर इन देशों में काम कर रहे भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स की दिक्कतें लगातार बढ़ती जा रही हैं. वहीं पूरे भारत के हजारों युवाओं के इन देशों में जाकर कॅरियर बनाने और कमाई करने के सपनों पर भी ग्रहण लग गया है. निश्चित रूप से भारत के लिए करीब 115 अरब डॉलर की सालाना विदेशी मुद्रा कमाने वाले आईटी सेवा उद्योग की विकसित देशों के वीजा संबंधी कठोर निर्णय से चिंताएं बढ़ गई हैं.

स्थिति यह है कि आईटी उद्योग की निकाय नैसकॉम ने एक अप्रत्याशित कदम के तहत चालू वित्त वर्ष 2०17-18 के लिए बढ़त का अनुमान लगाने का निर्णय टाल दिया है. आईटी के इतिहास में यह पहला मौका है जबकि आईटी उद्योग विकसित देशों में नियामकीय बदलाव और आर्थिक परिदृश्य के चलते भारी अनिश्चितता का सामना कर रहा है.

गौरतलब है कि डब्ल्यूटीओ दुनिया को वैश्विक गांव बनाने का सपना लिये हुए एक ऐसा वैश्विक संगठन है, जो व्यापार एवं वाणिज्य को सहज एवं सुगम बनाने का उद्देश्य रखता है. यद्यपि डब्ल्यूटीओ 1 जनवरी, 1995 से प्रभावी हुआ, परंतु वास्तव में यह 1947 में स्थापित एक बहुपक्षीय व्यापारिक व्यवस्था प्रशुल्क एवं व्यापार पर सामान्य समझौता (गैट) के नये एवं बहुआयामी रूप में अस्तित्व में आया है. जहां गैट वार्ता वस्तुओं के व्यापार एवं बाजारों में पहुंच के लिए प्रशुल्क संबंधी कटौतियों तक सीमित रही थी, वहीं इससे आगे बढ़कर डब्ल्यूटीओ वैश्विक व्यापारिक नियमों को अधिक कारगर बनाने के प्रयास के साथ-साथ सेवाओं एवं कृषि में व्यापार पर वार्ता को व्यापक बनाने का लक्ष्य रहा है.

डब्ल्यूटीओ के सदस्य देशों ने सब्सिडी, सीमा शुल्क में कटौती, व्यापार की अन्य बाधाओं को दूर करने के लिए 2००1 में दोहा दौर की व्यापार वार्ता शुरू की थी, जिसे वर्ष 2००4 में समाप्त होना था. परंतु यह वार्ता अब तक पूरी नहीं हुई है. स्थिति यह है कि अमेरिका और अन्य विकसित देशों की स्वार्थपूर्ण गुटबंदी ने कृषि एवं औद्योगिक टैरिफ कटौती सहित कई मुद्दों पर विकासशील देशों के हितों को ध्यान में नहीं रखा. यदि पिछले 21 वर्षो में डब्ल्यूटीओ के तहत विकासशील देशों को प्राप्त लाभों का मूल्यांकन करें तो पता चलता है कि दुनिया के विकासशील देशों को कोई सार्थक लाभ प्राप्त नहीं हुए हैं. भारत जैसे विकासशील देशों को सेवाओं एवं कृषि उत्पादों सहित अनेक सामानों के निर्यात में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ा रहा है.

ख्यात अर्थशास्त्री एवं नोबल पुरस्कार विजेता जोसेफ ई स्टिग्लिट्ज का कहना है कि 1994 में जब उन्होंने विश्व बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री के रूप में गैट वार्ता के उरुग्वे दौर की समीक्षा की थी, तब से अब तक उन्होंने पाया है कि डब्ल्यूटीओ का एजेंडा एवं उसके परिणाम दोनों ही विकासशील देशों के खिलाफ हैं. निसंदेह अमेरिका और अन्य विकसित देशों से उभरी संरक्षण की चुनौतियों के बीच भारतीय पेशेवरों की चिंताओं से निपटने के लिए सरकार को विशेष रणनीति अपनानी होगी. विश्व व्यापार संगठन के तहत विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की पेशेवर प्रतिभाओं पर लगाई जा रही वीजा रोक प्रवाह का मुद्दा जोरदार ढंग से उठाना होगा. यह बात आगे बढ़ाई जानी होगी कि भारत जैसे विकासशील देशों में वैीकरण से उत्पन्न रोजगार की चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों का सामना करने के लिए पूंजी की तरह मानव श्रम का अंतरराष्ट्रीयकरण आवश्यक है. पूंजी की तरह मानव श्रम की स्वतंत्र आवाजाही से भारत जैसे देशों की रोजगार चिंताएं कम होंगी.

उल्लेखनीय है कि व्यापार एवं उद्योग मंत्री निर्मला सीतारमन ने विकसित देशों के संरक्षणवादी रवैये पर डब्ल्यूटीओ को एक नया वैश्विक ढांचा तैयार करने का एक प्रस्ताव भेजा है, जिसके तहत सेवाओं के मामले में व्यापारिक सहूलियतों से जुड़े एक नये करार की मांग की गई है. इस प्रस्ताव के लिए सभी विकासशील देशों का समर्थन लिया जाना होगा. यह पहलू चर्चा में लाना जरूरी है कि यदि भारत जैसे देशों ने जवाबी कार्रवाई के तौर पर अपने बाजार विदेशी कंपनियों के लिए बंद किए तो वैीकरण की दिशा पलटती हुई दिखाई दे सकती है. ऐसे प्रयासों से विकसित देशों के संरक्षणवादी कदमों से भारतीय पेशवरों सहित विकासशील देशों को रोजगार मुश्किलों से बचाया जा सकेगा. ऐसा होने पर ही दुनिया वैीकरण की डगर पर आगे बढ़ सकेगी.

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