जटिल अफगान भू-राजनीतिक समीकरण

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जी. पार्थसारथी
दिसंबर 1979 में जब से सोवियत संघ ने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया था तब से लेकर आज तक वह वैश्विक भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता का एक केंद्र बना हुआ है। अफगान लोगों का मानना है कि उनके दुखों और मुसीबतों का मुख्य कारण पड़ोसी देश पाकिस्तान की दुष्ट नीतियां और महत्वाकांक्षाएं हैं। हालांकि वर्ष 2००1 के सितंबर माह की 11 तारीख को न्यूयार्क के ट्विन टावर्स पर हुए आतंकी हमले के बाद अमेरिका के नेतृत्व में अफगानिस्तान पर किए गए सैन्य अभियान के बाद वहां बाहरी प्रतिद्वंद्विता में काफी कमी आई है लेकिन समझौते और शांति की संभावना आज भी काफी क्षीण बनी हुई है। इस मामले पर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का गहरा मतभेद रूस, चीन, पाकिस्तान और ईरान के साथ है।

तालिबान और हक्कानी नेटवर्क जैसे इस्लामिक गुटों को बढ़ावा देकर अफगानिस्तान पर उनका कब्जा करवाकर वहां पर अपना प्रभाव बनाए रखने की पाकिस्तान की नीति में कोई बदलाव नहीं आया है। पुराने अनुभव के आधार पर भारत का अफगानिस्तान को लेकर एक बार फिर से चिंतित होना जायज है। पहले भी पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी गुटों ने अफगानिस्तान पर एक समय में अपना राज कायम कर लिया था। ये वही लोग थे जिन्होंने भारतीय हवाई जहाज को अगवा किया था। चीन ने अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार को बहुत कम आर्थिक सहायता मुहैया करवाई है। अलबत्ता उसने आईएसआई का इस्तेमाल करते हुए तालिबान के साथ अपने संबंध मजबूत जरूर किए हैं और इस हेतु पाकिस्तान की पीठ पर हाथ रखा है कि वह तालिबान और अफगान सरकार के बीच ‘संवाद’ करवाए।

चीन और पाकिस्तान के इन संयुक्त प्रयासों को पहले-पहल अमेरिका की तत्कालीन ओबामा सरकार का भी समर्थन प्राप्त था और वह भी तालिबान को अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त अफगान सरकार के बराबर का एक हिस्सेदार मान रही थी लेकिन जैसा कि पूर्वानुमान था, ये वार्ताएं असफल रहीं। कोई भी आत्मसम्मान वाली अफगान सरकार नहीं चाहेगी कि देश के भविष्य हेतु होने वाली वार्ताओं में आईएसआई द्वारा समर्थित तालिबान को उसके बराबर का दर्जा दिया जाए।

राष्ट्रपति चुनाव में अमेरिका के व्यस्त हो जाने के कारण परिदृश्य में रूस का पदार्पण हो गया था। चीन और पाकिस्तान के साथ मिलकर रूस की यह कवायद अफगानी सरकार को घेरने की रही है। भारत ने संयुक्त उपक्रम को एक ऐसे कूटनीतिक प्रयास के तौर पर देखा है जो तालिबान को मान्यता देने का प्रयास है जबकि अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को यह मंजूर नहीं है। जैसे ही रूस ने इस घटनाक्रम पर भारत और अफगानिस्तान की नापसंदगी भांपी तो उसने वार्ता के मंच को विस्तार देने के इरादे से भारत, ईरान और अमेरिका को भी इस मंच में सदस्यता देने की पेशकश की। परंतु अमेरिका ने यह कह कर शामिल होने से इनकार कर दिया कि रूस सही-सही जवाब नहीं दे पाया है कि वास्तव में इस सबके पीछे उसका मकसद क्या है।

अलबत्ता वार्ता प्रक्रिया में सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने का रूसी प्रयास अनिश्चितता के बीच असफल हो गया। उधर कतर में अपना तथाकथित दफ्तर बनाए बैठे तालिबान किसी भी शांति वार्ता में अपना दर्जा बाकायदा चुनी हुई अफगान सरकार के बराबर माने जाने की बात कह रहा है। चूंकि तालिबान के साथ चीन एक हद से ज्यादा करीबी रिश्ता नहीं बना पाया तो इसे भांपते हुए रूस ने पाकिस्तान की मदद से उनके साथ अपना राब्ता काफी बढ़ा लिया है। अमेरिकी और अफगान सरकार के अनुसार रूस ने तालिबान को मध्यम दर्जे के हथियार मुहैया करवाए हैं।

रूस ने सीरिया में अपना साथ दे रहे ईरान को समझाया है कि वह अफगानिस्तान के मामले में भी उसके साथ खड़ा रहे, लेकिन अपने प्रति अमेरिका का दुराव भांपते हुई ईरानी सरकार ने रूस को इस मामले में अनुगृहीत किया है। हालांकि इससे पहले ईरान भारत और रूस के साथ मिलकर तालिबान के मुकाबले में खड़े होने वाले नॉर्दर्न एलाएंस नामक संगठन का समर्थन कर रहा था। अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ले. जनरल मैक्मास्टर ने हाल ही में काबुल और दिल्ली की यात्रा की है। उनकी यह यात्रा ट्रंप सरकार द्वारा पिछले दिनों अफगानिस्तान-पाक सीमा के पास स्थित नंगाहार प्रांत में आईएसआई के गुप्त ठिकानों पर मदर ऑफ ऑल बॉम्बस का इस्तेमाल करने को अनुमति देने के आदेश के आलोक में हुई है।

वैश्विक आतंकवाद में पाकिस्तान का नजदीकी संबंध इस बात से एक बार फिर उजागर हो जाता है जब खबरें आईं कि बिन लादेन के उत्तराधिकारी अयमान-अल-जवाहिरी को भी आईएसआई ने अपने सुरक्षा घेरे में कराची में छिपा रखा है। यमन और अन्य जगहों पर जहां अमेरिकी फौज आज भी अल कायदा से लड़ाई में फंसी हुई है, इसके मद्देनजर अफगानिस्तान और भारत को चाहिए कि वे अमेरिका और अन्य देशों पर राजनयिक दबाव बनाएं ताकि कट्टरवाद और वैश्विक इस्लामिक आतंकवाद को पाकिस्तान द्वारा जो अनवरत मदद आज भी जारी है, उसका पर्दाफाश हो सके। क्षेत्रीय स्तर पर भारत को चाहिए कि वह रूस, ईरान और मध्य एशियाई गणतंत्रों को अपने साथ मिलाकर अफगानिस्तान की कानूनन निर्वाचित सरकार द्वारा देश के अंदर शांति स्थापना के प्रयासों को बिना-शर्त समर्थन दिलवाने का काम करे। इस बीच अफगानस्तिान को हमारी सैन्य और आर्थिक सहायता जारी रहनी चाहिए।

अफगानिस्तान को लेकर बनाई गई अपनी नीतियों को बदलने में पाकिस्तान की सरकार को तभी मजबूर किया जा सकता है जब भारत अन्य देशों के साथ मिलकर ऐसा माहौल बनवा दे जब-जब वह रावलपिंडी के सेना-मुख्यालय से आने वाले हुक्मों की तामील करे तब-तब इसकी एवज में पाक को घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारी खामियाजा उठाना पड़े। इसमें कोई शक नहीं कि भारतीय प्रशासन अवश्य विचार कर रहा होगा कि इस मंतव्य को पूरा करने हेतु क्या-क्या करने की जरूरत है।

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