आधार की गोपनीयता अधर में

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अभिषेक कुमार
झारखंड से 22 अप्रैल को खबर आई थी कि राज्य सरकार की लापरवाही से प्रदेश के 14 लाख से अधिक लोगों का आधार डाटा सार्वजनिक हो गया। मामले का खुलासा हुआ तो सरकार ने वेबसाइट से आधार नंबर इनक्रिप्ट (कूटभाषा में) कर दिया। लेकिन अब पता चला है कि देश के अलग-अलग सरकारी विभागों ने करीब साढ़े 13 करोड़ लोगों के आधार कार्ड का डाटा लीक कर दिया है। यह जानकारी बेंगलुरु की सेंटर फॉर इंटरनेट एंड सोसायटी द्वारा जारी एक रिपोर्ट से मिली है।

रिपोर्ट के मुताबिक करोड़ों लोगों के आधार कार्ड की सूचनाएं कोई भी देख सकता है। इनमें से पहले दो डाटा बेस केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय से जुड़े हुए हैं, जिसमें नेशनल सोशल असिस्टेंट प्रोग्राम का डैशबोर्ड और नेशनल रूरल एम्प्लॉयमेंट गारंटी एक्ट (मनरेगा) का पोर्टल शामिल है। इसके अलावा दो डाटा बेस आंध्र प्रदेश से जुड़े हैं, जिनमें इस राज्य का मनरेगा पोर्टल और चंद्राना बीमा नामक सरकारी स्कीम की वेबसाइट है। कुल चार वेब पोर्टल से लीक हुए आधार नंबर 13 से 13.5 करोड़ के बीच हो सकते हैं।

इसी तरह नेशनल सोशल असिस्टेंट प्रोग्राम के पोर्टल पर आधार कार्ड से जुड़े हुए 94.32 लाख से ज्यादा बैंक खातों और 14.98 लाख से ज्यादा डाकघर खातों की जानकारी है। सवाल है कि इस लीक का जिम्मेदार कौन है और अब इसकी गारंटी क्या है कि आइंदा ऐसा कभी नहीं होगा। हाल में एक सेलिब्रिटी के मामले में सूचना-प्रसारण मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आश्वस्त किया था कि वे सुनिश्चित करेंगे कि आधार से जुड़ी सूचनाएं लीक न हों लेकिन इस लीकेज ने उनके सारे आश्वासनों में सेंध लगा दी है।

यूं केंद्र सरकार कह सकती है कि सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय 25 अप्रैल को ही आधार कार्ड की लीकेज के बारे में राज्यों सरकारों को एक पत्र के जरिये चेता चुका है, लेकिन ऐसी चेतावनी का फायदा क्या हुआ। क्या इस लीकेज के लिए संबंधित विभागों के अधिकारियों को दंडित किया जाएगा, क्योंकि आधार कानून-2०16 के मुताबिक आधार से जुड़ी कोई भी जानकारी-जैसे कि नाम, जन्म तिथि, पता आदि को सार्वजनिक करना अपराध है।

ऐसे वक्त में जब सरकार आधार कार्ड को हर चीज से जोडऩे पर आमादा है, सवाल उठता है कि क्या उसे इसकी जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए। अगर वह ऐसा नहीं कर सकती तो आधार कार्ड के औचित्य को साबित करना उसके लिए मुश्किल होगा। इसके बावजूद किसी भी सरकारी योजना का लाभ पाने के लिए इसे अनिवार्य किया जा रहा है। इधर अदालतें लगातार इसके क्रियान्वयन से जुड़ी विसंगतियों को देखते हुए इसकी अनिवार्यता को कठघरे में खड़ा कर रही हैं लेकिन सरकार इसे हर चीज से जोडऩे पर उतारू है।

ड्राइविंग लाइसेंस, मोबाइल फोन, गैस कनेक्शन, पीडीएस, मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं के अलावा 36 कार्यक्रमों के लिये आधार कार्ड या तो अनिवार्य किया जा चुका है या एक तय समयावधि में कर दिया जाएगा। अब सरकार पचास अन्य कार्यक्रमों को आधार से जोडऩे का मन बना चुकी है। अब तो सरकारी स्कूलों में उन्हीं बच्चों को मिड डे मील दिया जायेगा, जिनके पास आधार कार्ड होंगे।

माना जा रहा है कि देश में 2० करोड़ बच्चों के आधार कार्ड अभी नहीं बन पाए हैं। सरकार की दलील है कि आधार के क्रियान्वयन से भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और सरकारी योजनाओं को बेहतर ढंग से लागू किया जा सकेगा। ं सरकार से यह पूछने का हक तो बनता ही है कि आखिर वह हर नागरिक की जानकारी जुटाकर ऐसे डाटाबेस में क्यों डाल देना चाहती है, जिससे पता चले कि उसने कब और कहां कितने की खरीददारी की, कब टिकट बुक कराई, उसका मोबाइल किसी एक वक्त में कहां था। आधार कानून कहता है कि अगर कोई व्यक्ति, संस्था, एजेंसी किसी नागरिक के आधार कार्ड की जानकारी मांगे तो बायोमैट्रिक्स (यानी उंगलियों, अंगूठे और पुतलियों की छाप) के अलावा अन्य जानकारियां पैसा लेकर दे सकती है लेकिन लीकेज में तो करोड़ों लोगों की बायोमैट्रिक्स पहचानें यहां से वहां चली गई हैं।

आधार जैसी चीजें अमेरिका में भी हैं। वहां नागरिकों को पेंशन की सुविधा के लिए ‘सोशल सिक्यूरिटी नंबर’ दिया जाता है और फिर उस नंबर को अन्य सुविधाओं से जोड़ा जाता है। पर अमेरिकी कानून यह सुनिश्चित करता है कि उस नंबर को कौन मांग सकता है और उसका क्या उपयोग होगा। चूंकि अभी भी साइबर हैकिंग से संबंधित अंतर्राष्ट्रीय फ्रेमवर्क और कानूनों की कमी है, ऐसे में लगता नहीं कि इन सूचनाओं को फिलहाल लीकेज से पूरी तरह सुरक्षित बनाया जा सकेगा।

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