बेलगाम  नौकर शाह

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परिसम्पत्तियों के बंटवारे पर कल मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह द्वारा बुलाई गयी अधिकारियों की बैठक के बाद उसे इस बात का अहसास बखूबी हो गया होगा कि सूबे के यह अधिकारी कितने कर्मठ है और उनकी कार्यशैली क्या है?

उत्तर प्रदेश के साथ परिसम्पत्तियों के बंटवारे का मामला 16 सालों से लम्बित है उसे लेकर यह सूबे के अधिकारी कितने संजीदा है इसका प्रमाण कल की समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री को मिल चुका है। इन परिसम्पत्तियों के बंटवारे को लेकर सीएम त्रिवेन्द्र रावत लखनऊ तक की दौड़ लगा रहे है तथा दोनों राज्यों में भाजपा की सरकार होने का तर्क देकर आशाओं का ताना बाना बुन रहे है उससे इन अधिकारियों को कोई सरोकार नहीं है।

जब इन अधिकारियों को यह पता था कि सीएम इस मुद्दे पर समीक्षा बैठक करने वाले है और वह इसे लेकर अत्यन्त गम्भीर है फिर भी अधिकारियों द्वारा इस पर कोई गौर न किया जाना उनकी लापरवाही और मनमाने तरीके से काम करने का ही प्रमाण है।

जिन दर्जन भर विभागों के अधिकारियों के साथ सीएम को समीक्षा बैठक करनी थीे उन्हे पूरी तैयारी के साथ बैठक में आने को कहा गया था इसके बावजूद भी यह अधिकारी बिना किसी तैयारी के बैठक में पहुंचे और सीएम के सवालों का जवाब तक नहीं दे पाये इसका सीधा सा अर्थ है कि यह अधिकारी सीएम के आदेशों को भी कोई तब्जोह नहीं देते है ऐसी स्थिति में सीएम त्रिवेन्द्र सिंह रावत भला क्या काम कर पायेंगे? यह सहज समझा जा सकता है। नाराज सीएम त्रिवेन्द्र ने भले ही इन अधिकारियों को निलम्बन तक की चेतावनी दे दी हो और 15 दिन का समय देते हुए फिर बैठक बुलाई हो लेकिन सवाल यह है कि क्या त्रिवेन्द्र रावत इन अधिकारियों की कार्य संस्कृति को बदल पायेगे?

उत्तराखण्ड के विकास को पलीता लगाने में इन अधिकारियों की मनमानी एक बड़ा कारण रहा है देखना होगा कि मुख्यमंत्री की सख्ती का अब इन अधिकारियों पर क्या प्रभाव पड़ता है।

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