ढलान पर ‘आप’

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एमसीडी चुनाव के बाद आम आदमी पार्टी में उठा तूफान थमने का नाम नहीं ले रहा। कहना कठिन है कि पार्टी अपने संकट से पूरी तरह उबर गई है या नहीं। पार्टी के नेता कुमार विश्वास को मना लिया गया है। पीएसी की बैठक में विधायक अमानतुल्लाह को पार्टी से सस्पेंड करने का फैसला लिया गया, जबकि कुमार विश्वास को राजस्थान का प्रभारी नियुक्त किया गया है। अमानतुल्लाह ने कुमार विश्वास पर पार्टी तोडऩे के आरोप लगाए थे।

अभी ‘आप’ में वे तमाम तरह के राजनीतिक ड्रामे देखने को मिल रहे हैं, जो अन्य पार्टियों में मिलते रहे हैं। जाहिर है, ‘आप’ अब आंदोलन की पार्टी नहीं रह गई है। देश को एक वैकल्पिक राजनीति देने का उसका दावा भी कमजोर पड़ गया है। अन्ना आंदोलन के दौरान इसकी स्थापना हुई तो लगा था कि यह पार्टी भारतीय राजनीति की संस्कृति बदलेगी। राजनीतिक दल भी सकते में थे।

‘आप’ के आगमन से उनके भीतर अपनी जमीन छिनने का भय पैदा हो गया था। इससे उनकी भाषा बदली और कुछ समय तक वे भी खुद को सादगी का समर्थक बताने लगे। दिल्ली का शासन संभालने के पहले दौर में ‘आप’ सरकार का स्वरूप आंदोलन वाला ही रहा। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल केंद्र सरकार के खिलाफ आंदोलनकारी रवैया अपनाए रहे। कुछ लोगों ने इसे अव्यावहारिक माना, फिर भी ‘आप’ में उनका विश्वास बना रहा।

जल्द ही दिल्ली में दूसरी बार चुनाव हुए तो पार्टी को छप्पर फाड़कर वोट मिले। लेकिन फिर ‘आप’ में जिस तरह का आंतरिक संघर्ष शुरू हुआ, उससे लगा कि उसके भीतर भी विचार का संकट है। जिस तरह इसके कुछ संस्थापक सदस्यों को बाहर निकाला गया, उससे तय हो गया कि पार्टी आंदोलन के आदर्शों के बजाय परंपरागत राजनीति के व्यावहारिक उसूलों पर ही चलेगी। इस तरह ‘आप’ एक व्यापक वैचारिक मंच न रहकर एक सामान्य राजनीतिक दल बनकर रह गई और भारतीय लोकतंत्र की सभी विसंगतियां इसमें झलकने लग गईं। इसके नेताओं पर आर्थिक भ्रष्टाचार से लेकर व्यभिचार तक के आरोप लगे, जिनमें कुछ सही भी साबित हुए।

‘आप’ जिन उद्देश्यों को लेकर आई थी, वे आज न जाने कहां छूट गए हैं। उसने कुल जमा यही किया कि जो लोग राष्ट्रीय दलों में अपने लिए गुंजाइश नहीं बना पा रहे थे, उन्हें राजनीति करने का अवसर दिया। इस तरह एक नया राजनीतिक वर्ग बना, जो चरित्र के स्तर पर मौजूदा पॉलिटिकल क्लास से अलग नहीं है। जनता यह समझ रही है, इसलिए उसने नगरपालिका चुनावों में ‘आप’ से किनारा कर लिया।

कुल मिलाकर यह पार्टी न तो आंदोलन को आगे बढ़ा पाई, न अलग तरह की सरकार दे पाई, न ही सियासत का मुहावरा बदल पाई। अपनी खोई साख वापस पाने के लिए उसे इन्हीं कसौटियों पर खुद को खरा साबित करना होगा।(आरएनएस)

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