कल्याणकारी  नीतियों की हकीकत

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भरत झुनझुनवाला
हाल के दिल्ली के नगर निगम चुनाव में भाजपा को भारी जीत हासिल हुई है। इसके पूर्व पांच राज्यों के चुनावों में भी भाजपा को भारी जीत मिली थी। ये जीतें निवर्तमान सरकारों के विरुद्ध नेगेटिव वोटों के कारण हैं। पंजाब में कांग्रेस की विजय से प्रमाणित होता है कि जनता ने भाजपा की नीतियों के पक्ष में वोट नहीं दिया था। वास्तव में जनता उत्तर प्रदेश में यादवों से और उत्तराखंड में कांग्रेस के भ्रष्टाचार से कराह उठी थी। फलस्वरूप इन राज्यों में भाजपा को वोट मिले। पंजाब में जनता अकाली सरकार के परिवारवाद से त्रस्त हो गई थी, इसलिये यहां कांग्रेस को वोट मिले।

दिल्ली के नगर निगम चुनावों में आप पार्टी के विधायकों के भ्रष्टाचार तथा अरविंद केजरीवाल की अकड़ से जनता त्रस्त थी। नतीजा यह हुआ कि यहां भाजपा विजयी हुई। गोवा और मणिपुर में इस प्रकार का नेगेटिव वोट नहीं था। इन राज्यों में भाजपा को स्पष्ट बहुमत भी नहीं मिला। यदि जनता ने भाजपा की नीतियों के पक्ष में वोट दिया होता तो पंजाब, गोवा और मणिपुर में भी भाजपा को बहुमत मिलना चाहिये था।

भाजपा ने देश को साफ-सुथरा एवं कारगर शासन उपलब्ध कराया है। इससे जनता का प्रसन्न होना स्वाभाविक है। परन्तु मात्र सुशासन ही पर्याप्त नहीं होता। शासन की दिशा भी सही होनी चाहिये। गलत दिशा में गाड़ी को ईमानदारी से चलाने की क्या सार्थकता है? बीते तीन वर्षों में सरकार द्वारा लागू नीतियों से जनता को राहत कम ही मिली है। भाजपा को चाहिये कि अपनी कथित जनहितकारी नीतियों का मौलिक पुनर्मूल्यांकन करे ताकि साफ-सुथरे शासन के साथ-साथ जनता को सही नीतियों का लाभ भी मिल सके।

भाजपा द्वारा लागू पहली जनहितकारी नीति जन धन योजना थी। उस समय कहा गया था कि इस योजना के माध्यम से आम आदमी को बैंकों से ऋण मिल सकेगा। वह सूदखोरों से मुक्त हो जायेगा। परन्तु जन धन योजना का परिणाम कुछ और ही सामने आया है। बैंकों ने जन धन खातेदारों को ऋण कम ही दिये हैं। बल्कि इस योजना के दो दुष्परिणाम सामने आये हैं। बैंकों ने जन धन खातों के संचालन में हो रहे खर्च की भरपाई करने के लिये सामान्य खाताधारकों से अधिक चार्ज वसूलना चालू कर दिया है। दूसरा दुष्परिणाम यह हुआ है कि गरीब ने अपनी रकम बैंक में जमा करायी है। इस रकम के उपलब्ध होने से बैंक के पास तरलता बढ़ी है, जिसके कारण ब्याज दरें घट रही हैं। ब्याज दरों में इस घटोतरी का लाभ उन उद्यमियों को हो रहा है, जिन्होंने बड़े पैमाने पर बैंकों से ऋण ले रखे हैं। जन धन योजना को जनहितकारी बताकर लागू किया गया था परन्तु इसका परिणाम आम आदमी पर बैंक के चार्ज का बोझ डालने एवं अमीर को लाभ पहुंचाने में हुआ है।

भाजपा सरकार द्वारा लागू दूसरा कदम कैशलेस इकोनॉमी का है। सोच है कि कैशलेस व्यवस्था में टैक्स की चोरी कम होगी। अर्थव्यवस्था पर नोट छापने का बोझ घटेगा। इस बचत से अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी, जिससे आम आदमी को रोजगार मिलेंगे। इस सोच की वास्तविकता को समझने के लिये समाज के तीन वर्गों पर कैशलेस इकोनॉमी के अलग-अलग प्रभाव को समझना होगा। पहला वर्ग आम आदमी का है। आम आदमी को कैशलेस लेनदेन के लिये स्मार्ट फोन खरीदना होता है। इसमें डाटा पैक डालना होता है। कैशलेस लेनदेन में समय अधिक लगता है। जैसे आप पहले अपने फोन से दुकानदार को पैसा ट्रान्सफर करेंगे। फिर दुकानदार से पूछेंगे कि उसे रकम मिली या नहीं। इस कार्य में आपका और दुकानदार, दोनों का समय व्यय होगा। कैशलेस लेनदेन के लिये पहले पेटीएम जैसे पोर्टल के पास रकम जमा करानी पड़ती है। यह रकम आपके खाते में रहती तो इस पर आपको ब्याज मिलता। कैशलेस व्यवस्था में आप इस ब्याज से वंचित रह जाते हैं। ऐसे में प्रत्येक कैशलेस लेनदेन का आम आदमी पर 3 से 4 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

समाज का दूसरा वर्ग सफेद इकोनॉमी में कार्यरत बड़े व्यापारियों का है। इन्होंने पहले ही कैशलेस लेनदेन को अपना लिया था। ग्राहक से बड़ी रकम प्राप्त करने तथा सप्लायर को पेमेंट पहले ही कैशलेस तरीके से की जा रही थी क्योंकि इसमें समय और खर्च की भारी बचत होती है। इन पर कैशलेस इकोनॉमी का प्रभाव शून्यप्राय है, चूंकि ये पहले ही उस स्थान पर पहुंच चुके हैं। समाज का तीसरा वर्ग काली इकोनॉमी में कार्यरत बड़े व्यापारियों का है। ये पूर्व में बैंकिंग व्यवस्था के बाहर लेनदेन करते थे। आज भी ये बैंकिंग व्यवस्था के बाहर ही हैं। कुछ उद्यमियों ने बताया कि काला धन्धा नोटबंदी के बाद कुछ समय के लिये मंदा पड़ा था। अब वह पूर्ववत चल पड़ा है। कुछ व्यापारियों का मानना था कि जीएसटी लागू होने के बाद काला धंधा आसान हो जायेगा।

वर्तमान में काला धंधा करने के लिये सेल्स टैक्स और एक्साइज ड्यूटी के दो अधिकारियों से सेटिंग करनी पड़ती है। जीएसटी लागू होने के बाद एक ही से सेटिंग करनी पड़ेगी। अत: कैशलेस इकोनॉमी का इस वर्ग पर प्रभाव नगण्य रहेगा। अंतिम आकलन है कि कैशलेस इकोनॉमी से आम आदमी पर बोझ पड़ेगा जबकि बड़े व्यापारियों पर इसका प्रभाव शून्यप्राय रहेगा।

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