अदालती हस्तक्षेप से जगी उम्मीदें

0
116

अनूप भटनागर
भ्रष्टाचार से निजात पाना सरकारों के लिये बहुत बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इसकी एक वजह उच्च पदों पर आसीन राजनीतिक व्यक्तियों और नौकरशाही के एक वर्ग की अनैतिक तरीके से काम करने और कराने वालों के साथ किसी न किसी तरह की सांठगांठ है।

यूं तो देश के आजाद होने के बाद से ही भ्रष्टाचार अपनी जड़ें फैलाने लगा था लेकिन पिछले करीब तीन दशक के दौरान इसने व्यवस्था के लगभग सभी हिस्सों को अपनी चपेट में ले लिया है। हाल के वर्षों में 2जी स्पेक्ट्रम और कोयला खदान आवंटन प्रकरण इसके उदाहरण हैं, जिसमें मंत्री से लेकर व्यवसायी तक इसकी चपेट में आये। भ्रष्टाचार से निपटने के लिये अन्ना हजारे सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ऐसे मामलों की जांच के लिये लोकपाल संस्था की स्थापना को लेकर देशव्यापी आन्दोलन किया। इसी आन्दोलन का नतीजा था कि भ्रष्टाचार के आरोपों की शिकायतों की जांच के लिये संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार ने 2०13 में लोकपाल और लोकायुक्त कानून बनाया।

उम्मीद थी कि सरकार लोकपाल संस्था स्थापित करने की दिशा में ठोस कदम उठायेगी लेकिन 2०14 के लोकसभा चुनावों के बाद एक तकनीकी मुद्दे की आड़ लेकर केन्द्र सरकार इस व्यवस्था को मूर्त रूप देने से अब तक बचती रही। लोकपाल और इसके सदस्यों के चयन की प्रक्रिया के लिये चयन समिति में प्रतिपक्ष के नेता के शामिल होने के कानूनी प्रावधान का सहारा लेकर सरकार कहती रही कि अब कानून में संशोधन करके लोकसभा में विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता को इसमें शामिल करने का प्रावधान करना होगा। लेकिन ढाई साल से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद जब ऐसा नहीं हुआ तो उच्चतम न्यायालय को सख्त रुख दिखाना पड़ा।

लोकपाल संस्था की स्थापना में विलंब के बारे में केन्द्र सरकार की तमाम दलीलों को दरकिनार करते हुए उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मौजूदा कानून के प्रावधानों के अंतर्गत चयन समिति में प्रतिपक्ष के नेता के बगैर भी लोकपाल और इसके सदस्यों के चयन की प्रक्रिया पूरी तरह वैध होगी। लोकपाल और लोकायुक्त कानून, 2०13 के तहत लोकपाल और इसके आठ सदस्यों की नियुक्ति के लिये चयनित नामों की राष्ट्रपति से सिफारिश करने वाली चयन समिति के सदस्यों में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, देश के प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा मनोनीत व्यक्ति, प्रतिपक्ष के नेता और एक प्रबुद्ध व्यक्ति शामिल है।

2०14 के आम चुनाव के नतीजों के बाद चूंकि लोकसभा में कोई भी विपक्षी दल प्रतिपक्ष के नेता के लिये अनिवार्य औपचारिकता को पूरा नहीं करता था, इसलिए सरकार ने इसी प्रावधान की आड़ लेते हुए लोकपाल की नियुक्ति में विलंब किया। हालांकि इस कानून की धारा 4 में यह प्रावधान भी किया गया था कि चयन समिति में कोई रिक्त स्थान होने की वजह से लोकपाल और इसके सदस्यों की नियुक्तियां अवैध नहीं होंगी।

इस प्रावधान के तहत इस समय लोकपाल के अध्यक्ष पद के लिये देश के कम से कम चार पूर्व प्रधान न्यायाधीश पात्रता रखते हैं। लोकपाल संस्था में अध्यक्ष के अलावा आठ सदस्य होंगे। इनमें से 5० फीसदी न्यायिक सदस्य होंगे। इसका मतलब यह हुआ कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश या फिर उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ही इनके न्यायिक सदस्य होंगे। यही नहीं, इन आठ सदस्यों में कम से 5० फीसदी सदस्य अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछडे वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं के वर्ग से होंगे।

लोकपाल संस्था के अध्यक्ष का चयन आसान हो सकता है लेकिन आठ सदस्यों में से अनुसूचित जाति, जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यक और महिलाओं के वर्ग से चार सदस्यों का चयन करना इस उच्चस्तरीय चयन समिति के लिये चुनौती भरा काम होगा।

इससे पहले, केन्द्रीय स्तर पर देश की राजधानी में लोकपाल संस्था का कार्यालय स्थापित करना और इसमें अपेक्षित संख्या में अधिकारियों तथा कर्मचारियों की नियुक्ति करनी होगी। यही नहीं, इस संस्था को हर प्रकार की बुनियादी सुविधायें मुहैया करानी होंगी ताकि लोकपाल संस्था सुचारु ढंग से अपना काम कर सके। अब देखना यह है कि देश की शीर्ष अदालत की व्यवस्था के बाद प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधान न्यायाधीश और एक नामचीन व्यक्ति वाली चयन समिति कब लोकपाल संस्था के अध्यक्ष और इसके सदस्यों के चयन का काम शुरू करती है।

देशवासियों की निगाहें इस पर भी रहेंगी कि उच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगने की स्थिति में लोकपाल और इसके सदस्य किस तरह की कार्रवाई करते हैं और ऐसे मामलों का कितने समय में निस्तारण करते हैं।

LEAVE A REPLY